किसानो की फसल को अपनी राजनीतिक फसल ना बनाइए…

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CHHATTISGARH.CO DATE 14/10/2020;-2018 विधान सभा चुनाव के बाद प्रदेश की राजनीति ने नई करवट ली किसानों की कर्जमाफी और धान के समर्थन मूल्य चुनाव के बाजी पलटने वाले मुद्दे माने गए, किसान हितों की बात करते हुए मुख्य मंत्री के पद पर आसिन हुए, नरवा, गरवा, घुरवा और बारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सदृढ़ करने वाले सरकार की महत्वकांक्षी योजनाओं के शुरूआत सरकार ने की सरकार के मुखिया किसान राज्य कृषि प्रधान है, धान मुख्य पैदावार धान है, ऐसे में छत्तीसगढ़ की राजनीति में किसान हितों की अनदेखी नही की जा सकती हैं, राज्य की सत्ता को साधने के लिए किसान जरूरी है, सत्ता के पलड़ा को अपनी तरफ झुकाने के लिए राजनीतिक दल किसान हितो की पुरजोर वकालत करते हैं, किसानों के नाम पे राजनीति करने का आरोप प्रत्यारोप रोज सुर्खियों में रहते हैं, किसान हर हितैषी दलों के होते हुए किसान कैसे आत्महत्या करते हैं।
राजनीति में क्या दिखाने और खाने के दांत में फर्क होता हैं, एक सरकार का किसान हितैषी कृषि बिल दूसरे सरकार के लिए किसान बिल भी कैसे हो जाता हैं, वर्तमान सरकार यदि किसानों को 2500 रू. प्रति क्ंिवटल धान का समर्थन मूल्य दे सकती हैं, तो पूर्ववर्तीय सरकार के इसमें तकलीफ क्यों हो रही थी एक ही विषय पर राजनीति दृष्टिकोण में कार्य योजना में इतना फर्क कैसे आ जाता हैं। सरकार के आने जाने से प्राथमिकता भले बदल सकते हैं। पर विकास तो निरंतरता का परिणाम हैं, किसान अपनी खेतों में फसल ये देख नही बोता किसकी सरकार हैं। पर सरकारें किसान और उनके फसलों के साथ भी राजनीति खेल देती है, बिल बताने का अधिकार राज्य सरकार का है या केन्द्र सरकार का इस बात से किसान क्या करेगा किसान किसानी में उम्मीद ये करता हैं, अच्छे मानसून, अच्छी फसल और अच्छी फसलों की किमत की उम्मीद सिर्फ उम्मीदों में पैसे खर्च करता हैं। व्यवसाय से ज्यादा खतरा मोल लेता है, नागरिक को अन्न देता हैं अन्नदाता की चुनौतियों के लिए सरकारों की क्यों चढ़ जाती त्वोरिया राज्य में पधारे केन्द्र मंत्री ने प्रदेश के मुखिया को जवाबदारी से भागने वाला कह दिया किसान के नाम पर राजनीति करने वाला बता दिया, बिल पर किसका अधिकार ये भी बता दिया। यदि किसान के नाम पर राजनीति हो रही तो 15 साल तक आपकी सरकार थी आप क्यों नही किये, किश्तों मे ही सही किसान को 2500 रू. आपने धान का, अपने राज में क्यों नही दिया। विश्व के सबसे बड़े राजनीति दल के 15 साल के शासन में इतनी दूरदर्शिता क्यों नही थी, कि वे अपने धन्यधान रूपी सत्ता को धान की किमत पर गवा बैठे, यदि राज्य सरकार कृषि बिल का बेवजह विरोध कर रहे तो आपके छत्तीसगढ़ के सांसद क्या कर रहे हैं, इन सांसदों की लाखों मतो से जीत मिली, ये वे जादूगर थे जिन्होंने विधानसभा चुनाव के पूरे आंकड़े बदल लोकसभा सीटे जीती, क्या पूरे किसानों से बात नही करनी चाहिए। नीति पर फुली बहस क्यों नही होती, ऐसा कोई किसान सम्मेलन क्यों नही होता, जिसमें सांसद, विधायक खुले मंच से अपनी-अपनी कृषि नीति पर बहस करते किसान हितैषी है तो जनमत के सामने संवाद से क्यो परहेज, आरोप प्रत्यारोप से क्या किसान का भला होगा क्या कानून किसान को बनाना है, कानून में गलतियां है तो एक दूसरे की पीठ क्यो खुजा रहे हैं, किसान की पीठ पर खाज क्यों बना रहे है, दोनो अपनी अपनी खाजा बना क्यो खा रहे है। आप राजा आप खाये खाजा, किसान करे चिरौरी आप खेले आंख मिचौली राजनीति में एक हो ली पक्ष विपक्ष की दामन चोली, लाखों मतों को अपनी ओर मोड़ लेने की क्षमता रखने वाले राजनीतिक दल क्यों कभी योजनाओं को सहमत नही हो पाते विकास तो सबका होना है, सब करेगे तभी होता है, इसमें पक्ष विपक्ष का विकास अलग-अलग कैसे विकास की हर बात पर विरोध पर अपने वेतन विकास पर अखिल भारतीय राजनीति एकीकरण का कारण क्या हैं, बतायेगें एक फसल खराब हो जाने से किसान कर्ज में डुब जाता है, आप चुनाव दर चुनाव हारते जीतते आबाद ही रहते हैं, क्या ये चुनाव जितने से ही पुरे जीवन का विकास कर लेते है, पक्ष विपक्ष से कुतर्क अब तो मंत्री जी के बोल अपनी ही सरकार के खोल रहे पोल, गजराजो के लिए बनाए जा रहे लेमरू प्रोजेक्ट में भी उन्हें राज गहरे दिख रहे किसानो के साथ आमरण अनशन करने को आतुर दिख रहे हैं। दिख रहा है राज्य सरकार में दो ध्रुव बन रहे हैं, चिन्ता किसान की है या किसान रूपी मतों की, मतों की होगी तो राजनीति होगी, किसानों की होगी तो, छत्तीसगढ़ की पहचान धान के कटोरे की होगी, फैसला आपका अपना राजनीति विकास करना है या किसान का छत्तीसगढ़ का। किसानो की फसल को अपनी राजनीतिक फसल ना बनाइये।

  • चोखेलाल

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मुखिया के मुखारी में व्यवस्था पर चोट करती चोखेलाल की आक्रामक टिप्पणियों के लिए पढ़ते रहिये।
कलम का कौशल, महाकोशल और chhattisgarh. co

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