राजनीति में घात… आघात… प्रतिघात…

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भारतीय राजनीति में विपक्ष के ताकत का क्षरण दिनों दिन बहुत तेजी से हो रहा है। यहां जिस तरह परिवारवाद हावी हो गया है, वह नई राजनीतिक शक्तियों को अपनी ही पार्टी में पनपने नहीं देना चाहता। भारत की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस भी इसी समस्या से जूझ रही है। परिवारवाद तो जैसे राजनीतिक दलों की पहचान है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों इस रोग से संक्रमित होते रहते हैं, लेकिन विपक्षी दलों में इसका संक्रमण अब रोग का रूप ले चुका है। कांग्रेस भी इससे अछूती नहीं है। विपक्षी कमजोरी को सत्ता पक्ष अपना हथियार बना चुका है और कमजोर विपक्ष देश के भविष्य के लिए कदापि उचित नहीं। राजनीतिक झंझावतों में घिरा विपक्ष ‘मुण्डे मुण्डे मतिर भिन्नताÓ की वजह से कोई वैकल्पिक राजनीति का मार्ग नहीं ढूंढ पा रहा है। मतदाताओं ने तो विपक्ष को मौका भी दिया, लेकिन वे अपने ही अंतरविरोध में फंसकर रह गए। मतदाताओं के विश्वास का क्षरण करने वाले कृत्य करने लगे।
मध्यप्रदेश का घटनाक्रम इसका ताजा उदाहरण है। लोकसभा चुनाव हारने के बाद कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कई पन्नों का त्यागपत्र लिखा। इसमें जो कारण उन्होंने गिनाए उसमें से एक यह भी था कि कांग्रेस के बुजुर्ग नेता पुत्र मोह में फंसे हुए हैं। यही वजह थी कि टिकट का बंटवारा भी ठीक से नहीं करने दिए। पार्टी की जीत की जगह पुत्रों को विजयश्री दिलाने में सारी ताकत लगा दी। इसलिए पार्टी को अपेक्षित चुनाव परिणाम नहीं मिला। अब यदि अध्यक्ष इतना निरीह हो जाए कि निर्णय लेने में खुद को असमर्थ पाए तो फिर उस राजनीतिक दल का वजूद क्या रह जाएगा? परिवारवाद से जन्मा नेतृत्व ही जब परिवारवाद की तरफ उंगली उठाए तो सिद्ध हो जाता है कि समस्या की जड़ का अंदाजा उन्हें भी है। इसके बावजूद कार्रवाई न कर पाना अपराधबोध का द्योतक है। पंद्रह साल सत्ता में रही भाजपा को उखाड़ फेंकने के लिए जिस मनोयोग से कांग्रेस की युवा शक्ति ने प्रयास किए, उसका परिणाम इनको क्या मिला? दिशाहीन, तथ्यहीन, जनभावनाओं के विपरित मुद्दे उठाए गए। इसे ही अपनी उपलब्धि समझी और विधानसभा चुनाव में हासिल जीत को लोकसभा चुनाव तक बड़ी हार में बदल लिया। सत्तर पार के नेताओं को अपने दो राज्यों की कमान सौंपी, जहां आप मामूली बहुमत से सरकार में थे और हैं। मध्य प्रदेश की राजनीति में नेता कम पिता की हैसियत को ज्यादा अहमियत देने वाले दोनों दिग्गजों के पुत्र, मंत्री और सांसद। एक मुख्यमंत्री हंै और दूसरे को राज्यसभा में जाना था। ऐसे में असंतोष पनपना ही था। परिणाम भी सामने है। असुरक्षा इतनी की प्रदेश अध्यक्ष भी आप ही हैं।
अपने ही कर्मों से व्यापक छवि के जननेताओं को खो दिया। उस पर भाजपा की सधी हुई चाल। भव्य स्वागत के साथ प्रदेश कार्यालय में स्व. सिंधिया जी की तस्वीर भी थी। माल्यार्पण करते वक्त क्या मनोदशा रही होगी, नवांगतुक की? भावनाओं की क्या कीमत होती है और उसका किस प्रयोजन से उपयोग किया गया, ये कांग्रेस को समझाना है। दोष मढऩे से दिशाहीनता ही मिलेगी, परिणाम नहीं। मुश्किल से हाथ आई सत्ता निजी पारिवारिक स्वार्थ और गुटबाजी की भेंट चढ़ा। नेताओं की राजनीति ढलान पर है, फिर भी पार्टी हितों पर इस निरंकुशता से कुठाराघात। तमाशों की राजनीति का भौंडा प्रदर्शन करने बंगलुरु गए, मंत्री की स्वीकार्यता मध्यप्रदेश में कितनी है? जिस मसले को लेकर आप सर्वोच्च न्यायालय जाने की बात कर रहे हैं, वहां भी भद पिटनी तय है। साक्ष्य को न मानने की जिद, सीएए पर राज्यसभा में वरिष्ठ नेता और नामी वकील का कबूलनामा सिद्धांतों को तिरोहित कर अल्पकालीन राजनैतिक लक्ष्यों को पाने की हड़बडाहट से ज्यादा कुछ नहीं दिखता। हरियाणा में तलवार निकल चुकी है, बिहार में बुरा हाल है, राजस्थान की मखमली सत्ता कब मरूस्थल में बदल जायेगी, महाराष्ट्र में कब महा हार हो जाए। इसकी तरफ किसी का ध्यान ही नहीं है।
सर्जिकल स्ट्राइक, नोटबंदी, राफेल, चौकीदार चोर, के बाद शाहीन बाग सीएए को मुद्दा बनाने की असफल कोशिश पार्टी की लोकप्रियता को बट्टा लगा रही है। अपनी स्वीकार्यता को प्रदेश दर प्रदेश देश में घटा ही रही है। मत को प्रभावित कर सकने वाले अदला-बदली में चुनाव जीतने वाले को राजस्थान की कमान, जो अपने पुत्र को मुख्यमंत्री रहते चुनाव नहीं जिता सकते, वो कैसे पार्टी की नैया राजस्थान में पार लगा लेंगे, जहां वैसे ही पानी की कमी है। कई प्रदेशों में आप क्षेत्रीय दलों के सहयोगी हैं, यूपी में आपके पास अपनी परंपरागत अमेठी सीट भी नहीं रही। आपका शीर्ष नेतृत्व अपनी सीट हार गया। इसी हार से सबक ले लेते। असंभव कुछ भी नहीं है। दृढ़ इच्छा शक्ति के बल पर पारिवारिक कही जाने वाली अमेठी का नेतृत्व बिना किसी पारिवारिक पृष्टभूमि के महिला ने जीत ली। और आप देखते रह गए।
बिना किसी राजनैतिक सोच और लक्ष्य के आज भी वही कृत्य दोहराये जा रहे हंै कि आपको राजनैतिक हानि हो, जहां समस्या नहीं है, वहां भी समस्या पैदा करने का राजनीतिक शगल प्रचंड बहुमत की छत्तीसगढ़ सरकार को भी आप छत्तीसगढिय़ा अस्मिता से दूर करने का प्रयास कर रहे हैं। राज्य सभा में छत्तीसगढ़ की सरदारी आपने बाहरी को क्यों दी? छत्तीसगढ़ ने आपको जिताया, अपना मत दिया और आपने छत्तीसगढिय़ों के आत्मस्वाभिमान, राजनीतिक समझ की उपेक्षा कर ही क्यों? छत्तीसगढ़ कांग्रेस ने क्या ऐसे दो नेता नहीं थे, जो छत्तीसगढिय़ों की बात कह सके। क्षेत्र में विधायकों और मंत्रियों से ये सवाल पूछे जाएंगे तो क्या जबाव होगा, उनका? हमारे विधायक मंत्री, क्या हमको ही इतना योग्य नहीं समझते? मत हमारा, मर्जी दिल्ली की, ये कैसी राजनीति है? छत्तीसगढिय़ों की उपेक्षा से सत्ता के समीकरण क्या साधे जा सकते हैं।
भाजपा प्रवेश करते समय महाराज की भाव भंगिमा पढि़ए और भगवा स्वागत के बाद पिता की तस्वीर पर मायापर्ण करते हुए उनके मनोभाव समझिए तो अंतर स्पष्ट हो जाएगा। आघात, वह भी कहीं व्यक्ति पर तो कहीं पूरे प्रदेशवासियों पर, आखिर क्यों? कृत्य कभी ऐसे ना हों कि आघात से बड़ा प्रतिघात मिल जाए।
चोखेलाल
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