मुखिया के मुखारी – हम राजनीतिज्ञ हमें है नहीं सुधरना….

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कुएं की गहराई और स्वच्छता पानी को पेय बनाती है, तालाब की विशालता कुए की उपयोगिता के आगे छोटी पड़ जाती है, पर ना इससे तालाब की उपयोगिता खत्म होती है ना कुए की श्रेष्ठता ठीक वैसे ही चरित्र और व्यक्तित्व की गहराई सफलता के शिखर को भी थामें रखती है । सफलता के शिखर पर बने रहना है, तो अपनी उपयोगिता बढ़ानी होंगी । सफलता अपनी वैभवता में कब अति उत्साही बना देती है, कब व्यक्ति अहम ब्रह्मास्मि की गिरफ्त में आता है पता ही नहीं चलता जिस सफलता में सारी शक्तियां निहित हो वो मदान्धता भी देती है।

“ सत्ता ” की सफलता असीमित अधिकारों और शक्तियों के साथ मिलती है । और यही से अति की शुरुआत होती है । अति सर्वत्र वर्जते पर सूक्तियो की दास्तां सत्ता ने कब स्वीकार की है या कर सकती है । सत्ताधीशो की जंग भी अति महत्वाकांक्षा का परिणाम होती है । पन्द्रह सालों के शासन ने पूर्ववर्ती सरकार को आभासी बना दिया था, उन्हें लगता था कि चुनाव तो महज एक औपचारिकता है, छत्तीसगढ़ की सत्ता तो उनकी बंधुआ है, उन्हीं के खुटे से बंधी रहेगी, दरवाजे पर दास्ता की दस्तक देगी उन्हीं के देहरी पर आजीवन बनी रहेगी । ये आभासी भ्रम टूटा ऐतिहासिक हार नगण्य संख्या बल के साथ सत्ता गई, कमजोर विपक्ष के तमगे के साथ लंबी खामोशी पहचान की जद्दोजहद । नवजात छत्तीसगढ़ में भय और अहम का टकराव देखा,सत्ताधीशो की निरंकुशता और समन्वय की कमी को भी देखा परिणाम हार, तीन चुनावों की स्थाई हार उनकी गलती से हम जीते हमारी गलती से आप, आपकी गलती से फिर वो जीतेंगे, पर गलती नहीं सुधारेंगे ।

राजनीतिज्ञ न अपना चलन बदल सकते हैं न अपना चरित्र जनसेवा की बात कहते नहीं अघाते पर स्वसेवा के अलावा कुछ भाता नहीं । परिश्रम की जगह परिक्रमा भाती है फिर लोकतंत्र में राजतंत्र दिखता है और ऐसा सुना नेता राजा बन जाता है । राजा बन निरंकुशता एकला चलो रे का भाव कहां का समन्वय कैसा सदभाव सदा कुर्सी जाने का भाव इस भाव को हरिराम नाई और बड़ा करते हैं फिर जन नेता राजनेता बन जाते हैं जहां जन की चिंता कम सिर्फ और सिर्फ अपने राज की चिंता रहती है ।
छत्तीसगढ़ की राजनीति में भी कोई बोल रहा डोल रहा है, तो कहीं कोई अड़ा है खड़ा है, इनके बीच चाउर वाले बाबा ने मौन तोड़ा है । सांसों के संघर्ष को सत्ता संघर्ष में बदलते देख विपक्ष ने भी मोर्चा खोला है ।

अपराधों का ग्राफ बढ़ रहा अवस्थाओं की लंबी फेहरिस्त गिनाई जा रही,विपक्ष के पास आरोपों की लड़ी है तो सत्ता पक्ष में झगड़ों की झड़ी है ।गजब की राजनीति है । संभावनाओ के बाट तुला में अदल – बदल रहे और अदला बदली की चाह में कई चिकने मुद्दों पर ताव दे रहे । सब कुछ बदल रहा बस नहीं बदल रही तो लोकतंत्र में राजतंत्र वाली मानसिकता स्वार्थ के लिए अर्थ बदलती वाणी सत्ता के लिए पाला बदलती राजनीति यहां तो एक ही दल में रहकर आका बदले जा रहे, कौन किसका समर्थक जिधर सत्ता वहीं इनका अड्डा । छत्तीसगढ़ की राजनीति में राजधानी की तस्वीर बहुत कुछ बता रही, सिपाही अब बिना मुखिया के गणेश उत्सव की बधाई दे रहा है बेटा में बैर निभा रहा अब ये किसकी गलती है, परिश्रम के ऊपर परिक्रमा को भी चुना तो आपने ।

अपने – अपनों की लड़ाई में अपने ही अपनों से दूर हो रहे ,अपनों से ही मिल रहे इतने अपनों के संयोग से भी अपनों के बीच ही दुश्मन कैसे पैदा हो रहे । जमावड़ा अब जन समस्याओं के लिए नहीं होते लड़ाई जन की नही तो सड़क पे कैसे होगी? खासों की है तो जमावड़ा भी होटल में ही लगेगा । सो लग रहा है । माननीयों जन सेवकों को पांच सितारा होटल भाने लगे खा तो अभी भी हाथ से ही रहे पर छुरी कांटा एक दूसरे के ऊपर चला रहे । नई चलन नई है ये राजनीति होटलों में सत्ता समीकरण बिठाये जा रहे । जनता नहीं अब तो हाईकमान चुनेगा मुखिया सो सब कुछ हाई हो गया अब कमान किसके पास है इसका नहीं कोई अंदाजा । बड़ों की है ये बाते सत्ता का संघर्ष है गलतियों पर गलतियां करने का दौर है, विकास पथ पर प्रदेश बढ़े ना बढ़े हमें तो सत्ता पथ पर बढ़ना है – हम राजनीतिज्ञ हमें है नहीं सुधरना….

चोखेलाल
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मुखिया के मुखारी में व्यवस्था पर चोट करती चोखेलाल

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