विधानसभा सत्र में विधायक जनक ध्रुव ने उठाया फर्जी दस्तावेजों से वनाधिकार पट्टे का मामला 

विधानसभा सत्र में विधायक जनक ध्रुव ने उठाया फर्जी दस्तावेजों से वनाधिकार पट्टे का मामला 

रिपोर्टर -परमेश्वर राजपूत ,गरियाबंद : छत्तीसगढ़ विधानसभा सत्र 22 जुलाई से शुरू हुआ और पहले दिन ही विपक्ष ने फर्जी दस्तावेजों के सहारे वनाधिकार पट्टे का मामला उठाया।
बता दें कि बिन्द्रानवागढ़ विधानसभा क्षेत्र के विधायक जनक ध्रुव ने मैनपुर के शोभा क्षेत्र के वनाधिकार पट्टे में फर्जी दस्तावेजों के द्वारा वनाधिकार पट्टे लेने वालों के खिलाफ जांच और कार्यवाही की मांग की। जिसमें संबंधित मंत्री ने कहा कि जिला स्तरीय गठीत टीम के द्वारा जांच की गई जिसमें संबंधित व्यक्ति के द्वारा दावा नहीं करने की बात सामने आई जिसके बाद कलेक्टर ने इसे खारिज कर दिया। जिस पर विधायक ने कहा कि अगर संबंधित व्यक्ति के द्वारा दावा नहीं किया गया था तो वन विभाग के रेंजर और वनरक्षक एवं अन्य लोगों का दावा पत्र में कहां से हस्ताक्षर आया और संबंधित पंचायत के सरपंच सचिव को इस संबंध में उनके ऊपर कार्यवाही का नोटिस क्यों जारी किया गया। जिस संबंधित मंत्री ने कहा कि जो भी दस्तावेज है हमें उपलब्ध करा दीजिए हम अध्ययन कर आगे की कार्यवाही करेंगे।

जिस पर विधायक ने कहा कि इस पर एक जांच समिति गठित कर क्यों न जांच कराई जाए। वहीं सरकार के मंत्री के द्वारा कहा गया कि ये कांग्रेस सरकार के कार्यकाल का है जिस पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा कि किसी के सरकार के कार्यकाल का हो इस पर जांज होना चाहिए। वहीं विधायक ने कहा कि अपात्र लोगों के द्वारा कुटरचित तरीके से वनाधिकार पत्र प्राप्त किया जा रहा है और वास्तविक जो इसके पात्र हैं जो 2005 से उस जमीन पर काबिज़ हैं वे हितग्राही अभी तक वनाधिकार पत्र से वंचित होकर भटकने मजबूर हैं। 

वहीं इस प्रकार हम फर्जी वनाधिकार पत्र की बात करें तो एक मामला कुल्हाड़ी घाट का सामने आया था जिसकी जांच के बाद संबंधित व्यक्ति को जुर्माना और सजा भी सुनाया गया था। वहीं हम गरियाबंद जिले अंतर्गत आने वाले कई गांवों की बात करें तो ऐसे भी लोगों को वनाधिकार पत्र प्राप्त हुआ है जो अपना जमीन कहां पर है उसे पता नहीं है और वनाधिकार पत्र में धान बेचने और कर्ज लेने का काम कर रहे हैं और अपने प्राप्त वनाधिकार पत्र का जमीन ही नहीं पता है। दुसरी ओर कुछ कृषक जो कई वर्षो से उस जमीन पर खेती करते आ रहे हैं और उस जमीन का वनाधिकार पत्र किसी दूसरे के नाम में मिल गया है। कुछ कृषक पूर्व से खेती जिस जमीन पर करते आ रहे हैं और उस जमीन का वनाधिकार पत्र न मिलकर किसी दुसरे जमीन का वनाधिकार पत्र मिला हुआ है।इस पर सरकार और प्रशासन द्वारा सही तरीके से जांच कराई जाए तो कई वनाधिकार पत्र निरस्त हो जाएगा जो ग़लत तरीके से बनाकर सरकारी जमीन को हथियाकर प्रशासन और सरकार की आंखों में धूल झोंक रहे हैं अब आगे देखने वाली बात यह होगी कि क्या सरकार और प्रशासन इस पर कब तक जांच कराने में सफल हो पाती है।










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