दुर्ग : ग्राम गोढी तहसील धमधा जिला दुर्ग से सेवा निवृत शिक्षक बिसौहा राम साहू ने अपने गुरु स्वर्गीय गजानंद शर्मा की मूर्ति स्थापना की। बिसौहा राम साहू तथा उनकी धर्मपत्नी राधा बाई साहू के योगदान से ग्राम गोढी में अपने शिक्षक के सम्मान में यह मूर्ति बनवाए.साहू ने अपने 88वें जन्म दिवस के अवसर पर मूर्ति का अनावरण किया। साहू जी कहते हैं कि वह तथा आस पास के गांव के जितने भी लोग पढ़ लिख कर अच्छे पद पर हैं वह सब गुरुजी की ही देन है. निसंदेह वर्तमान समय में बिसौहा राम साहू जैसे शिष्य विर्ले ही मिलते हैं. इस कार्यक्रम में प्रचार्या अनिता मरकाम, शर्मा परिवार, साहू परिवार, स्कूल स्टाफ तथा समस्त बच्चे मौजुद थे। श्री गजानंद शर्मा का संक्षिप्त जीवन परिचय :- स्वर्गीय गजानंद शर्मा जी का जन्म 27 अक्टूबर 1917 को ग्राम ओटेबंद वर्तमान तहसील धमधा में हुआ था। प्राचीन समय से ओटेबंद-गोढी का यह क्षेत्र राजनीतिक चेतना का केंद्र रहा है. वे प्राथमिक शिक्षा मलपुरीकला में प्राप्त कर माध्यमिक शिक्षा के लिए अर्जुनदा ग्राम गए. बचपन से ही उनका झुकाव राष्ट्र प्रेम की ओर था तथा ग्राम के आस-पास कोई भी धार्मिक सामाजिक सम्मेलन होता या किसी राजनेता का आगमन होता तो वह अपने पिता के साथ जरूर जाते थे। सन् 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार का उस वक्त के विद्यार्थी जीवन में गहरा असर हुआ। इनके शिक्षक तथा आंदोलन के नेतृत्वकर्ता उम्मेद सिंह को जेल हुई। फ़िर अर्जुन्दा से शिक्षा समाप्त करके प्रशिक्षण के लिए वे बिलासपुर गए तथा वहां से 3 वर्ष प्रशिक्षण लेकर प्रथम पदस्थापना गुण्डरदेही में सं 1937 में हुई. 3 वर्ष पास्चात सं 1940 को गांव मलपुरीकला प्राथमिक शाला में पदस्थ हुए। ईसी बिच सं 1936 में पंडित नेहरू का आगमन हुआ जिन्हें सुनने वे रायपुर गए।
उस समय के जिला परिषद के अध्यक्ष वाय वि तामस्कर के कहे अनुसार राष्ट्रीय भाषण तथा विचारों का आदान प्रदान गुप्त रूप से होता था. फिर आया अगस्त 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन, जिले के तमाम नेता तथा उनके देशभक्त मित्र पकड़ लिए गए, जिस्से शर्मा जी उद्वेलित हो उठे. पर उस समय जेल जाना नसीब न हुआ लेकिन राष्ट्रीय झंडा उतारने आए पुलिस हवलदार से झड़प हो गई जिस्से गजानंद शर्मा जी का नाम ब्रिटिश शासन के शत्रुओ मे दर्ज हो गया। 15 जनवरी 1943 को शर्मा गुरुजी का विचार जेल यात्रा के लिए दृढ हो गया तथा उन्होंने आने वाले सोमवार 18 जनवरी को गोढी के आम बाजार में सत्याग्रह की सूचना जिला कांग्रेस कमेटी तथा कलेक्टर दुर्ग को दी. इसके बाद उन्हें डराया धमकाया और दबाव डाला गया पर वे न डिगे. 3 दिन बाद मुकद्दमा चला कर उन्हें 9 महीने सघन कारावास सजा हुई. वाह 21 जनवरी 1943 से 15 सितम्बर 1943 तक केन्द्रीय जेल रायपुर में रहे. जेल से छूटकर आने के बाद कुछ वर्ष अंग्रेजों से संघर्ष में बीते. सन 1947 में भारत के स्वतंत्र होने पर उन्हें पुन: प्रधान पाठक के रूप में गोढी में पदस्थापना मिली. अपने शिक्षकिय जीवन में इन्होने बहुत से क्षेत्रों में शिक्षा का प्रसार किये जिनमे से गोढी, कुम्हारी स्कूलो का निर्माण तथा नंदिनी, गुण्डरदेही और बेमेतरा में उल्लेखनिय शैक्षनिक योगदान दिये. वे शासकी स्कूल बेमेतरा से सेवा निर्वृत्त हुए. इसके बाद भी वे घूम-घूम कर लोगों में राष्ट्र प्रेम की भावना को सुदृढ़ रहे। देश के इस सच्चे सिपाही ने 30 मई 1998 को देह त्याग दिया तथा समाज को एक अपूर्णिय क्षति हुई..

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