वर्ष 2002 में गुजरात के गोधरा में सारबमती एक्सप्रेस आगजनी की घटना को लेकर अमित शाह के केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एक बड़ा अहम फैसला लिया है. इस घटना में अयोध्या से लौट रहे 59 हिंदू तीर्थयात्रियों की जलकर मौत हो गई थी.
इस घटना के बाद गुजरात में व्यापक स्तर पर दंगे भड़के थे, जिसमें बड़ी संख्या में लोग मारे गए थे. गोधरा कांड और फिर उसके बाद गुजरात में भड़के सांप्रदायिक दंगें ने राज्य और देश की राजनीति को काफी प्रभावित किया.
सूत्रों के मुताबिक गोधरा कांड के गवाहों की सुरक्षा हटा ली गई है. केंद्र सरकार ने 14 गवाहों की सुरक्षा हटाई है. इन गवाहों को 2009 से तत्कालीन यूपीए सरकार के रिकमेंडेशन पर सुरक्षा मिल रही थी, दो दिनों पहले ये सुरक्षा हटाई गई. पूर्व पीएम दिवंगत मनमोहन सिंह सरकार ने इन गवाहों को सुरक्षा मुहैया करवाई थी. गवाहों की सुरक्षा में केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) के 150 से ज्यादा जवान तैनात थे. केंद्रीय गृह मंत्रालय ने गोधरा कांड की जांच करने वाली एसआईटी के सुझाव पर यह फैसला लिया है. गोधरा कांड पर बनी एसआईटी ने 10 नवंबर 2023 को इन गवाहों की सुरक्षा हटाने की अपनी रिपोर्ट दी थी.
एक दर्दनाक घटना
गोधरा कांड 27 फरवरी 2002 को गुजरात के गोधरा शहर में हुआ एक दर्दनाक घटना थी. इसमें साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन को जलाया गया, जिससे 59 यात्री मारे गए. इनमें अधिकांश हिंदू तीर्थयात्री थे, जो अयोध्या मंदिर से लौट रहे थे. इस घटना के बाद गुजरात में व्यापक हिंसा फैल गई. इस हिंसा ने कई हफ्तों तक राज्य में अशांति मचाए रखी, जिससे सैकड़ों लोग मारे गए और कई और लोग घायल हो गए या अपने घरों से बेघर हो गए. इस घटना ने गुजरात के सांप्रदायिक सौहार्द को गहरी चोट पहुंचाई.
इस घटना का राज्य और देश की राजनीतिक पर गहरा प्रभाव पड़ा. कई जांचों और न्यायिक प्रक्रियाओं के बाद कुछ लोग दोषी पाए गए, जबकि कुछ को बरी कर दिया गया. यह घटना भारत के हालिया इतिहास का एक दुखद और बेहद संवेदनशील घटना थी.
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