कोरबा :सभापति चुनाव में भाजपा ने ही भाजपा प्रत्याशी को हराया

कोरबा :सभापति चुनाव में भाजपा ने ही भाजपा प्रत्याशी को हराया

 कोरबा :  छत्तीसगढ़ के कोरबा में नगर निगम सभापति चुनाव में भाजपा की ओर से अधिकृत उम्मीदवार तब पराजित हो गया, जब यहां भाजपा काफी मजबूत थी। संगठन को दरकिनार कर भाजपा के ही एक प्रत्याशी ने बगावत की और फॉर्म भर दिया।चुनाव में उसे 15 वोट से जीत मिली। लेकिन कहा जा रहा है कि, चुनाव में भाजपा ने ही भाजपा प्रत्याशी को हरा दिया।

दरसअल, 11 फरवरी को नगर निगम कोरबा के चुनाव हुए थे। जिसके परिणाम 15 फरवरी को घोषित हुए भाजपा की संजू देवी राजपूत महापौर निर्वाचित हुई जबकि, 45 वार्ड से इसी पार्टी के पार्षद जीतकर आये। इससे कहा जा रहा था कि, सभापति चुनाव में भाजपा के उम्मीदवार को बड़ी आसानी से जीत मिल जाएगी। सभापति के लिए कोरबा से कई पार्षदो ने दावा किया। पर्यवेक्षक से लेकर मंत्रियों तक बात पहुंची फिर भी सहमति नहीं बन सकी। पार्टी कार्यालय दीनदयाल कुंज में काफी मशक्कत के बाद भाजपा संगठन ने पूर्व नेता प्रतिपक्ष हितानन्द अग्रवाल को प्रत्याशी घोषित कर दिया। लेकिन हैरान करने वाली बात यह रही कि अधिकृत प्रत्याशी की घोषणा के बावजूद भाजपा पार्षद नूतन सिंह ने नामांकन दाखिल कर दिया।

15 वोटों से हुई जीत

जबकि, निर्दलीय और अन्य के समर्थन से निर्दलीय पार्षद अब्दुल रहमान ने भी नामांकन पेश किया। अजीत वसंत के द्वारा औपचारिकताओं के साथ मतदान की प्रक्रिया कराई गई। वोट की गिनती हुई तो हर कोई चौक उठा। भाजपा के घोषित प्रत्याशी हितानन्द अग्रवाल को महज 18 वोट मिले। जबकि, नूतन को 33 वोट प्राप्त प्राप्त हुए और वे विजयी हुए। जीत का अंतर 15 वोट का रहा। वही निर्दलीय अब्दुल रहमान को 16 वोट मिले।कलेक्टर ने चुनाव के नतीजे की घोषणा की।

भाजपा पार्षद की हुई जीत- मंत्री

चुनाव के नतीजे को लेकर कैबिनेट मंत्री लखन लाल देवांगन ने कहा कि, पांच लोगों के नाम पैनल में थे। किसी पर भी सहमति नहीं बन सकी। चुनाव में भाजपा संगठन ने अधिकृत रूप से हिता नंद अग्रवाल को प्रत्याशी बनाया गया था। हालांकि, जिसकी जीत हुई है वह भी भाजपा का ही पार्षद है।

सबको साथ लेकर चलने का किया जाएगा प्रयास- सभापति

वहीं सभापति निर्वाचित नूतन सिंह ने कहा कि, सदन में सबको साथ लेकर चलने का प्रयास किया जाएगा।

क्षेत्र में बना चर्चा का विषय

छत्तीसगढ़ के अधिकांश नगरीय निकायों में भाजपा ने अपने संख्या बल के आधार पर सभापति और उपाध्यक्ष का चुनाव आम सहमति से करने में सफलता प्राप्त कर ली। इस मामले में कोरबा को लेकर अपवाद कहा जा सकता है कि यहां सभापति के चुनाव में आम सहमति बन नहीं सकी और अनुशासन की कलई खुल गई। इसके साथ ही संगठन की अंतरकलह भी खुलकर उजागर हो गई। सभापति चुनाव के नतीजे के बाद अब हर तरफ इसी बात की चर्चा है कि राजनीति में कई ऐसे कारण होते हैं, जिससे अपने लोग ही अपनों को निपटा दिया करते हैं। अब कहां जा रहा है कि कोरबा से जुड़ा यह मामला प्रदेश के साथ-साथ केंद्र तक जरूर पहुंचेगा क्योंकि अनुशासन की डोर तो वहां से बंधी हुई है।







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