"छत्तीसगढ़ के अंतिम छोर मलेवा पहाड़ पर बसी जिंदगी: न सड़क, न स्कूल, न बिजली — मूलभूत सुविधाओं से कोसों दूर जनजातीय गांव"

"छत्तीसगढ़ के अंतिम छोर मलेवा पहाड़ पर बसी जिंदगी: न सड़क, न स्कूल, न बिजली — मूलभूत सुविधाओं से कोसों दूर जनजातीय गांव"

परमेश्वर राजपूत, गरियाबंद  : छत्तीसगढ़ के सुदूरवर्ती मलेवा क्षेत्र के पहाड़ी इलाकों में बसी विशेष पिछड़ी जनजातियों की जिंदगी आज भी विकास से कोसों दूर है। इन गांवों में न तो पक्की सड़कें हैं, न प्राथमिक शाला, और न ही बिजली की सुविधा। शिक्षा के नाम पर आंगनबाड़ी केंद्र है हर दिन इन ग्रामीणों को जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं से जूझते हुए कटता है।ग्राम थुहापानी विशेष पिछड़ी भुंजिया जनजातीय गांव हैं जहां 25-30 घरों के जनजातीय परिवार निवासरत है। इनका मुख्य जिविकोपार्जन कृषि एवं वनोपज संग्रहण है ये अपने संस्कृति व परंपरा के अनुसार आज भी जीवन यापन करते हैं। वहीं ये समुदाय बहुत ही सरल और सहज होते हैं इन समस्याओं के बीच भी ये प्रकृति के बीच शांत और सुकुन भरी जिंदगी व्यतीत करते हैं।


राज्य और केंद्र सरकारों द्वारा आदिवासी विकास के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन मलेवा के अंतिम छोर पर बसे इन गांवों की जमीनी हकीकत उन दावों को खोखला साबित करती है। बरसात के दिनों में कच्ची पगडंडियां कीचड़ में तब्दील हो जाती हैं नदी नाले में अभी तक पुलिया निर्माण नहीं हो पाया है। जिससे आवागमन पूरी तरह ठप हो जाता है। बच्चे आज भी शिक्षा के लिए 15 किलोमीटर अन्य गांवों में रहकर पढ़ाई करने को मजबूर हैं। स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है वहीं सहकारी उचित मुल्य की दुकानों पर चावल लेने के लिए नदी नाले को पारकर 15 किलोमीटर दूर जाने मजबूर होते हैं। तो दैनिक उपयोग का सामान लेने भी 15 किलोमीटर सफर करना पड़ता है। और ज्यादा बारिश हुई तो ये लोग अपने गांव से दुसरे गांव तक नहीं पहुंच पाते हैं ग्रामीणों का कहना है कि गांव तक बिजली और प्राथमिक शाला की व्यवस्था हमें बहुत जरूरी है हालांकि अभी सड़क का निर्माण कार्य प्रारंभ हुआ है।

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बिजली के खंभे और तार कहीं नजर नहीं आते, जिससे गांव आज भी अंधेरे में डूबा रहता है। ग्रामीणों का कहना है कुछ घरों में सौर ऊर्जा लगा है जिसमें रात का गुजारा जैसे तैसे करते हैं।चुनावों के दौरान नेता जरूर वादों की झड़ी लगाते हैं, लेकिन उसके बाद कोई पलट कर देखने तक नहीं आता। आज तक इन गांवों के लोग अपने बीच सांसद विधायक को नहीं देख पाये हैं।

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हालांकि इन गांवों का अब तक विकास नहीं हो पाने का एक बड़ा कारण ये भी सामने आया कि ये पहाड़ों पर बसे गांव घोर नक्सली क्षेत्र माना जाता था जिसके चलते विकास कार्य प्रभावित रहा लेकिन सरकार और जवानों के प्रयास के चलते नक्सलियों की मौजूदगी कम हुई है और विकास का कुछ दौर शुरू हुआ है। वहीं इन गांवों की स्थिति यह बताने के लिए पर्याप्त है कि विकास की रफ्तार अब भी उतना आसान नहीं पहाड़ी क्षेत्र होने के चलते कुछ चुनौतियां भी है। राज्य सरकार और प्रशासन को चाहिए कि इन विशेष पिछड़ी जनजातियों की सुध ले और जल्द से जल्द मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने का प्रयास करना चाहिए।










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