पाकिस्तान का पहला हिंदू मंत्री, बड़े अरमान लेकर जिन्ना के साथ गया था, फिर क्यों वहां से बैरंग लौटा

पाकिस्तान का पहला हिंदू मंत्री, बड़े अरमान लेकर जिन्ना के साथ गया था, फिर क्यों वहां से बैरंग लौटा

भारत को 15 अगस्त, 1947 को ब्रिटिश राज से आजादी मिली, लेकिन अंग्रेज जाते-जाते देश को दो टुकड़ों में बांटकर पाकिस्तान का निर्माण कर गए. भारत से पाकिस्तान जाने वाले मुहम्मद अली जिन्ना से लेकर लियाकत अली खान जैसे कई मुस्लिम चेहरे थे, लेकिन एक हिंदू नेता भी थे. सामाजिक व्यवस्था से दुखी और जिन्ना से प्रभावित होकर पाकिस्तान जाने वालों में एक किरदार जोगेंद्र नाथ मंडल का भी है.

जोगेंद्र नाथ मंडल, जैसा कि नाम से साफ है, वह हिंदू धर्म से ताल्लुक रखते थे और दलित समाज से थे. जोगेंद्र मंडल बड़ी उम्मीदें लेकर पाकिस्तान गए थे. पाकिस्तान के वह पहले कानून मंत्री बने, लेकिन जिन्ना के मरते ही उनकी सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया.

पाकिस्तान में धार्मिक कट्टरता बढ़ता देख मंडल समझ गए कि यह देश अब उनके लिए नहीं रहा और वह पाकिस्तान छोड़कर भारत लौट आए थे. ऐसे में उन्होंने पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री को लिखे अपने त्यागपत्र में साफ कहा था कि पाकिस्तान के सत्ता प्रतिष्ठान मजहब को एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं, जिसके साथ अब उनका पाकिस्तान में रहना उचित नहीं है.

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जानें कौन थे जोगेंद्र नाथ मंडल

जोगेंद्र नाथ मंडल का जन्म ब्रिटिश इंडिया की बंगाल प्रेसिडेंसी के बैरीसाल जिले के बाकरगंज कस्बे में एक किसान परिवार में हुआ था. वह नामशूद्र समुदाय में जन्मे थे, जो दलित समाज से थे. उनके पिता चाहते थे कि घर में कुछ हो या न हो, उनका बेटा शिक्षा जरूर हासिल करे. मंडल की पढ़ाई-लिखाई का खर्च उनके चाचा ने उठाया था.

मंडल ने अपनी शुरुआती शिक्षा स्थानीय स्कूल में ग्रहण करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए बैरीसाल के सबसे अच्छे शिक्षण संस्थान बृजमोहन कॉलेज में दाख़िला लिया. स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने 1934 में कानून की डिग्री ली. मंडल ने कानून की पढ़ाई तो की, लेकिन उसे पेशे के तौर पर नहीं अपनाया. उन्होंने दलितों पर अत्याचार और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई और अपना पूरा जीवन उनके उत्थान और समाज कल्याण के लिए लगाने का फैसला किया.

जोगेंद्र मंडल का सियासी सफर

जोगेंद्र नाथ मंडल ने शिक्षा पूरी करने के बाद बैरीसाल की नगर पालिका के चुनाव से अपने राजनीतिक सफर का आगाज किया. उन्होंने निचले तबके के लोगों के हालात सुधारने के लिए संघर्ष शुरू किया. इसके बाद 1937 के भारतीय प्रांतीय चुनावों में पूर्वी बंगाल की बाखरगंज नॉर्थ-ईस्ट विधानसभा सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर किस्मत आजमाई थी. इस चुनाव में उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के जिला समिति के अध्यक्ष सरल कुमार दत्ता को मात दी थी.

जोगेंद्र मंडल पर सबसे ज्यादा सियासी प्रभाव सुभाष चंद्र बोस का था. बोस के कांग्रेस छोड़ने के बाद जोगेंद्र मंडल मुस्लिम लीग से जुड़ गए थे. वह डॉ. अंबेडकर से काफी प्रभावित थे. संविधान सभा चुनाव में बंबई से अंबेडकर जीत नहीं सके तो उन्होंने फिर से बंगाल प्रांत से चुनाव लड़ा था. 1946 में अंबेडकर को संविधान सभा के चुनावों में बंगाल से जिताने में जोगेंद्र मंडल की बड़ी भूमिका थी. जोगेंद्र मंडल भी संविधान सभा के सदस्य थे और उन्होंने अंबेडकर से परिचर्चाएं कर, उन्हें सलाह देकर भारतीय संविधान के निर्माण में भी बड़ी भूमिका निभाई थी.

जिन्ना से प्रभावित जोगेंद्र नाथ मंडल

1946 के दंगों में जोगेंद्र नाथ मंडल ने पूर्वी बंगाल का दौरा किया और दलितों से मुस्लिमों के खिलाफ हिंसा न करने का आग्रह किया था, क्योंकि वह मुस्लिमों को भी दलितों की तरह हिंदू उच्च जातियों के शोषण का शिकार मानते थे. यहां उन्होंने मुस्लिम लीग का समर्थन किया और मुहम्मद अली जिन्ना के करीब आ गए. वह भारत के बंटवारे के पक्ष में नहीं थे, लेकिन उन्होंने महसूस किया कि उच्च जाति के हिंदुओं (सवर्णों) के बीच रहने से दलितों की स्थिति में सुधार नहीं हो सकता. इसलिए पाकिस्तान दलितों के लिए एक बेहतर अवसर हो सकता है.

अक्टूबर 1946 में अंतरिम भारत सरकार में जिन्ना ने जोगेंद्र नाथ मंडल को मुस्लिम लीग के पांच प्रतिनिधियों में चुना. जब उन्होंने जिन्ना के आश्वासन के बाद पाकिस्तान जाने का फैसला किया, तो उन्हें उनके सहयोगी और भारत के उस समय के सबसे बड़े दलित नेता डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर ने चेताया था. जिन्ना के प्रभाव में मंडल ने पाकिस्तान को चुना.

पाकिस्तान के पहले कानून मंत्री बने

देश का बंटवारे के बाद जोगेंद्र नाथ मंडल पाकिस्तान चले गए. वहां वह संविधान सभा के सदस्य होने के साथ अस्थायी अध्यक्ष बने. जिन्ना ने जोगेंद्र नाथ मंडल को पाकिस्तान की संविधान सभा के पहले सत्र की अध्यक्षता की जिम्मेदारी दी थी. किस्मत का खेल ऐसा हुआ कि डॉ. अंबेडकर भारत के पहले कानून मंत्री बने तो जोगेंद्र नाथ मंडल पाकिस्तान के पहले कानून मंत्री और श्रम मंत्री बने. हालांकि, कुछ ही साल बाद दोनों ही नेताओं को अपने पद से त्यागपत्र देना पड़ा.

जोगेंद्र नाथ मंडल ने 8 अक्टूबर, 1950 को इस्तीफा दे दिया तो अंबेडकर ने 27 सितंबर, 1951 को त्यागपत्र दे दिया. इस तरह दोनों के बीच फर्क यह था कि जोगेंद्र मंडल ने हताशा में त्यागपत्र दे दिया था. वह पाकिस्तान का संविधान बनते हुए नहीं देख सके, जबकि अंबेडकर ने जनवरी 1950 में भारत के संविधान को पूरा करके अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभाई.

जिन्ना की मौत के बाद मंडल की उम्मीदें टूटी

कराची जाने के बाद जोगेंद्र नाथ मंडल ने पाकिस्तान में दलितों के साथ भारी भेदभाव देखा और हिंदुओं के खिलाफ हुई हिंसा से खासा परेशान हो गए थे. इसके बाद सितंबर 1948 में जिन्ना की मौत के बाद उनका सियासी महत्व पाकिस्तानी सरकार में कम हो गया. पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खान से उन्होंने बहुत गुजारिश कर हिंदुओं और दलितों की समस्या की ओर ध्यान देने को कहा, लेकिन इसका कोई नतीजा नहीं निकल सका.

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जोगेंद्र नाथ मंडल ने पाकिस्तान के निर्माण में दलित स्वतंत्रता के सपने को साकार होते हुए देखा था, लेकिन हिंदू अल्पसंख्यकों के साथ होते भेदभाव ने उनकी सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया. पाकिस्तान में धार्मिक कट्टरपंथियों ने हिंदुओं पर अत्याचार और जुल्म शुरू कर दिए थे. इस तरह मंडल पाकिस्तान की राजनीति में खुद को अलग-थलग पा रहे थे.

जिन्ना की मौत के बाद कई ऐसी घटनाएं हुईं, जिनसे जोगेंद्र नाथ मंडल निराश हुए कि इस देश में अब अल्पसंख्यकों से किए गए वादों को पूरा करने वाला अब कोई नहीं था. बल्कि ऐसे लोग सरकार में आ गए थे जो बहुत शिद्दत के साथ मज़हब को रियासत पर थोप रहे थे. पाकिस्तान में मंडल के लिए जिंदगी इतनी मुश्किल भरी हो गई थी कि उन्हें पाकिस्तान छोड़कर भागना पड़ा.

पाकिस्तान में 'उद्देश्यों का संकल्प' पारित किया गया. मियां इफ्तिख़ारुद्दीन को छोड़कर संविधान सभा के सभी मुस्लिम सदस्यों ने इसके पक्ष में मतदान किया था, जबकि एक को छोड़कर सभी अल्पसंख्यक सदस्यों ने इस प्रस्ताव का विरोध किया था. एक अल्पसंख्यक सदस्य ने तो यहां तक कहा था कि अगर जिन्ना जीवित होते, तो ऐसा कोई संकल्प कभी पारित ही नहीं होता. मंडल 1950 तक प्रधानमंत्री लियाकत अली ख़ान के मंत्रिमंडल में बने रहे. इस दौरान उन्होंने बार-बार प्रधानमंत्री से पूर्वी पाकिस्तान में दलितों पर अत्याचार की शिकायत की.

जोगेंद्र मंडल ने अक्टूबर, 1950 में त्यागपत्र दे दिया, जिसमें उन्होंने अल्पसंख्यकों के भविष्य के बारे में अपनी निराशा का इज़हार करते हुए उन कारणों का ज़िक्र किया जिनसे उनकी यह राय कायम हुई थी. उन्होंने अपने इस्तीफ़े में लिखा था कि सेना, पुलिस और मुस्लिम लीग के कार्यकर्ताओं के हाथों बंगाल में सैकड़ों दलितों की हत्या की घटनाएं हुई हैं. इसे लेकर उन्हें बहुत दुख था और पाकिस्तान से उनका मोह पूरी तरह भंग हो गया.

पाकिस्तान से भारत लौट आए मंडल

जोगेंद्र नाथ मंडल ने पाकिस्तान सरकार से अपना इस्तीफा दे दिया, जो एक बड़ा राजनीतिक संकट बन गया था. खासकर जब मंडल कलकत्ता चले गए, तो उन्होंने पाकिस्तान पर और अधिक गंभीर आरोप लगाए. 1950 में पाकिस्तान छोड़ कर भारत के बंगाल राज्य में शिफ्ट हो गए, तो उन्हें अपनी ही जाति के लोगों ने भी शक की निगाहों से देखा, क्योंकि वह पाकिस्तान से आए थे.

हालांकि, पाकिस्तान जाने से पहले, वह भारत में दलितों के सबसे बड़े नेता डॉ. अंबेडकर के सहयोगी रहे थे, लेकिन अब मंडल का समर्थन करने वाला कोई नहीं था. 1950 में पाकिस्तान से भारत आने के बाद 1968 तक उन्होंने अपना अधिकांश समय कलकत्ता के एक बेहद पिछड़े इलाके में बिताया.

मंडल ने कांग्रेस के साथ संबंधों में सुधार करके 1952 में और फिर 1957 में उत्तरी कलकत्ता से चुनाव जीतने की कोशिश की लेकिन हर बार नाकाम रहे. उस वक्त वह बेहद पिछड़ा इलाक़ा था और दलितों के लिए आरक्षित लोकसभा क्षेत्र था. मंडल की मौत 1968 में हुई थी. एक नाव से नदी पार करते समय उन्हें दिल का दौरा पड़ा. नाविक के अलावा उस समय वहां कोई गवाह नहीं था. उनका पोस्टमार्टम भी नहीं किया गया था. हालांकि, मंडल की मौत के सही कारण का पता नहीं चल सका है.








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