नई दिल्ली : बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान को लेकर चुनाव आयोग विपक्षी दल के निशाने पर है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए हैं। विपक्षी दलों का आरोप है कि हालिया मतदाता सूची में भारी गड़बड़ी की गई है और इससे चुनाव की निष्पक्षता प्रभावित हो रही है।
विपक्ष का कहना है कि संसद में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया जाएगा। इस परिप्रेक्ष्य में ये जानना जरूरी हो जाता है कि क्या सीईसी को हटाना आसान है। चुनाव आयोग के सदस्यों की नियुक्ति के लिए वर्ष 2023 में पारित नए कानून के जरिये ये पूरा मामला समझते हैं।
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नए कानून के तहत सीईसी की नियुक्तिचुनाव आयोग के सदस्यों की नियुक्ति के लिए वर्ष 2023 में नया कानून पारित किया गया था। चुनाव आयुक्त की नियुक्ति, उनका कार्यकाल और उन्हें पद से हटाने की प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 324 और मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 के प्रावधानों के तहत होती है।
कौन करता है चुनाव आयुक्त की नियुक्ति?
सीईसी और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति करते हैं। इसके लिए तीन सदस्यों की एक चयन समिति सिफारिश करती है। इस समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता या लोकसभा में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता और केंद्रीय मंत्रिपरिषद के एक सदस्य होते हैं।
चयन समिति को उम्मीदवारों के नामों के प्रस्ताव कैबिनेट सचिव की अगुवाई में एक सर्च कमिटी देती है। नए कानून के अनुसार, जिन्हें इन पदों पर नियुक्त किया जाता है, उनका अतीत में सरकार में सचिव स्तर के पदों पर कार्यरत रहना जरूरी होता है। साथ ही उनके पास चुनाव प्रबंधन का अनुभव भी होना चाहिए।
पहले कैसे होती थी नियुक्ति?
2023 के अधिनियम से पहले चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति चुनाव आयोग (चुनाव आयुक्तों की सेवा शर्तें और कार्य संचालन) अधिनियम 1991 के तहत होती थी। मगर इस अधिनियम में चयन प्रक्रिया को परिभाषित नहीं किया गया था। ऐसे में प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद की सलाह पर राष्ट्रपति चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करते थे।
राष्ट्रपति के पास चुनाव आयुक्तों की संख्या निर्धारित करने की ताकत होती थी। सीईसी को पद से हटाने की प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 324(5) में कहा गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान तरीके और समान आधारों पर पद से हटाया जा सकता है। ठीक ऐसी ही व्यवस्था 2023 में आए अधिनियम की धारा 11(2) में भी की गई है।
क्या है महाभियोग की प्रक्रिया?
मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए संसद के दोनों सदनों के सदस्यों को स्पष्ट रूप से दुर्व्यवहार या अक्षमता का आरोप लगाते हुए एक प्रस्ताव लाना होगा। इसके लिए राज्यसभा के 50 या लोकसभा के 100 सांसदों के समर्थित प्रस्ताव को संसद में पेश करना होगा। प्रस्ताव स्वीकार होते ही एक जांच समिति गठित की जाती है, जिसमें आमतौर पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश या विशेषज्ञ शामिल होते हैं।
समिति यदि आरोपों को सही ठहराती है, तो संसद में उस प्रस्ताव पर बहस और मतदान होता है। साथ ही प्रस्ताव को संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत से पारित कराना होगा। सदन में प्रस्ताव के पारित होने के बाद सीईसी को हटाने के आदेश पर राष्ट्रपति को अंतिम मुहर लगानी होती है।
संविधान के अनुच्छेद 124(4) के अनुसार, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया बताई गई है, सीईसी को हटाने की कार्रवाई केवल तभी हो सकती है जब दुर्व्यवहार या अक्षमता सिद्ध हो। दुर्व्यवहार में भ्रष्ट आचरण या पद के दुरुपयोग जैसी गतिविधियां शामिल हो सकती हैं।
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नए कानून में सीईसी को हासिल है सुरक्षा
चुनाव आयोग को राजनीतिक दबाव से सुरक्षित रखने के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया को जानबूझकर बहुत कठिन बनाया गया है। 2023 के संशोधित कानून की धारा 16 के तहत सीईसी और चुनाव आयुक्तों को पद पर रहते हुए लिए गए निर्णयों के लिए किसी भी कानूनी कार्रवाई से छूट प्रदान की गई है। साल 2023 में सर्वोच्च न्यायालय ने इस मुद्दे की समीक्षा की और कहा कि चुनाव आयुक्तों को हटाने की प्रक्रिया में बदलाव करने के लिए संवैधानिक संशोधन करना पड़ेगा।
2009 में विपक्ष ने लाया था प्रस्ताव
गौरतलब है कि बीजेपी ने विपक्ष में रहते हुए इसी तरह का अभियान 2009 में चलाया था। तत्कालीन चुनाव आयुक्त नवीन चावला को हटाने की मांग को लेकर एनडीए के 205 सांसदों ने प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए थे। लेकिन उस समय लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया था।
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