भारतीय कृषि: परंपरा से आधुनिकता की ओर एक यात्रा

भारतीय कृषि: परंपरा से आधुनिकता की ओर एक यात्रा

कृषि का सांस्कृतिक महत्व

जैसे वेदों की ऋचाएं पीढ़ी दर पीढ़ी स्मृति में संचित होती थीं, वैसे ही किसान अपने अनुभव और ज्ञान को अगली पीढ़ियों तक पहुंचाते थे। ये अनुभव धीरे-धीरे कहावतों और लोकोक्तियों में बदल गए।

'घाघ' और 'भड्डरी' जैसे लोकज्ञानी आज भी किसानों की जुबान पर हैं, और उनकी कही बातें आज भी वैज्ञानिक परीक्षण में सही साबित होती हैं।

पारंपरिक कृषि की संरचना

पुराने समय में गांवों की संरचना ऐसी थी कि यहां केवल मनुष्य ही नहीं, बल्कि पशुओं के लिए भी स्थान था - जैसे चारागाह, गोचर, तालाब और पोखर। हर गांव में अनाज, दाल, तिलहन, सब्जी और फल का उत्पादन होता था। मडुआ, ज्वार, कोदो, तिवड़ा, कुल्थी, अलसी, कुट्टू जैसे मोटे अनाज पोषण से भरपूर होते थे और कम पानी में उगते थे।

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आधुनिकता का प्रभाव

लेकिन आज हम उस ज्ञान परंपरा से कट चुके हैं। विदेशी शिक्षा और जीवनशैली को अपनाने की दौड़ में हमने अपनी पारंपरिक कृषि और आत्मनिर्भरता को पीछे छोड़ दिया है। नतीजा यह है कि जब अन्न संकट की आहट सुनाई देती है, तो लोग राशन कार्ड के लिए महीनों सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाते हैं।

कृषि में बदलाव

अंग्रेजों ने हमारी कृषि व्यवस्था को भी निशाना बनाया। भारत को कच्चे माल का आपूर्तिकर्ता बना दिया गया, जिससे अनाज की खेती पीछे छूट गई। इसके परिणामस्वरूप, खेती महंगी होने लगी और गांव खाली होते चले गए।

वर्तमान स्थिति

आज भारत की कृषि योग्य जमीन का बड़ा हिस्सा मानसून पर निर्भर है। सिंचाई की सही व्यवस्था न होने से उत्पादन में अस्थिरता बनी रहती है। जहां कभी देश की 82% से अधिक आबादी खेती से जुड़ी थी, आज यह आंकड़ा घटकर 45% से भी नीचे चला गया है।

कृषि की दिशा में सुधार

सरकारें कृषि को लाभदायक बनाने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह पर्याप्त है? जब तक किसानों को उनकी ज़मीन पर खेती करने के बदले सुनिश्चित आय नहीं मिलेगी, तब तक वे खेत से जुड़े नहीं रह सकते।

परंपरागत कृषि का महत्व

परंपरागत कृषि केवल अन्न उपजाने की प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि यह एक समृद्ध सांस्कृतिक प्रणाली थी। आज देश भर में कृषि से जुड़ी योजनाओं में ऐसे अधिकारी बैठे हैं जिन्हें खेती का व्यावहारिक अनुभव नहीं है।

भविष्य की दिशा

आज ज़रूरत इस बात की है कि भारतीय कृषि को उसकी पारंपरिक समझ और जैव विविधता के साथ जोड़ा जाए। हमें अपनी विरासत को पुनः जीवित करना होगा। केवल रासायनिक खाद और ट्रैक्टर से खेती को टिकाऊ नहीं बनाया जा सकता।

निष्कर्ष

आज का खाद्यान्न संकट और महंगाई केवल नीति से नहीं, बल्कि खेती से ही सुलझ सकती है। हमें यह समझना होगा कि कृषि केवल अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि सभ्यता की नींव है।








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