साल 1911 से 1929 के बीच हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट से लगभग 130 किलोमीटर दूर दक्षिण में नाग्यरेव नाम के इलाक़े की कई महिलाओं ने 50 से अधिक मर्दों को ज़हर दे दिया था.इन महिलाओं को 'फ़रिश्ता बनाने वाली' कहा जाता था और उन्होंने मर्दों को ज़हर मिले आर्सेनिक के सॉल्यूशन से मार डाला था.कुछ लोगों ने इसे आधुनिक इतिहास में महिलाओं के हाथों मर्दों की सबसे बड़ी सामूहिक हत्या बताया है.
बाद में महिलाओं पर चले मुक़दमे के दौरान एक नाम बार-बार सामने आया. वो नाम था ज़ोज़साना फ़ाज़कास का. वह इस गांव की दाई थीं.उस वक़्त यह गांव ऑस्ट्रो-हंगरी साम्राज्य के अधीन था और वहाँ कोई स्थानीय डॉक्टर नहीं था. दाई को लोगों का दवा वगैहरा देती थीं.एक रेडियो डॉक्यूमेंट्री प्रोग्राम में गांव में रहने वाली मारिया गुनया ने बताया कि फ़ाज़कास को इसलिए ज़हर देने वाली मुख्य अभियुक्त के तौर पर पेश किया गया क्योंकि गांव की महिलाएँ अपनी व्यक्तिगत समस्याओं के बारे में उनसे खुलकर बात करती थीं.
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गुनया ने बताया कि फ़ाज़कास ने उन महिलाओं को समझाया कि अगर उन्हें पतियों या मर्दों के साथ कोई परेशानी है तो वह इसका एक आसान हल दे सकती हैं.हालाँकि फ़ाज़कास को सामूहिक हत्या की मुख्य अभियुक्त ठहराया गया, लेकिन मुक़दमे के दस्तावेज़ों में गांव की महिलाओं के बयानों से मर्दों की तरफ़ से दुर्व्यवहार, रेप और हिंसा की दर्दनाक कहानियाँ सामने आईं.
लेकिन यह कहानी कई सालों तक दबी रही. पुलिस रिपोर्ट्स के अनुसार शुरुआती हत्याएँ 1911 में हुईं, लेकिन 1929 तक इसकी जांच शुरू नहीं हुई.
आख़िर इन हत्याओं के बारे में पता कैसे चला?
फ़ाज़कास 1911 में नाग्यरेव गांव में आई थीं.
गुनया और मुक़दमे के अन्य गवाहों के अनुसार वह दो वजहों से सबकी नज़र में आ गईं. पहली यह कि दाई का काम जानने के साथ-साथ उन्हें दवाओं की भी जानकारी थी. उनके कुछ नुस्ख़ों में केमिकल भी शामिल होते थे, जो उस इलाक़े में आम बात नहीं थी.
दूसरी बात यह थी कि उनके पति का कोई अता-पता नहीं था.
गुनया के अनुसार, "नाग्यरेव में न कोई पादरी था और न ही डॉक्टर. इसलिए उनकी जानकारी ने लोगों को अपनी तरफ़ खींचा और लोग उन पर भरोसा करने लगे."उन्होंने बताया कि वह महिलाओं के घरों में कई बातों की गवाह बनीं, जैसे मर्दों का अपनी पत्नियों को मारना, उनका रेप करना और उनसे बेवफ़ाई करना.
इसलिए फ़ाज़कास ने एक ऐसा काम शुरू किया जो उस ज़माने में प्रतिबंधित था, यानी उन्होंने अबॉर्शन या गर्भपात करना शुरू कर दिया. इसकी वजह से उन्हें अदालत में भी पेश किया गया, लेकिन उन्हें कभी सज़ा नहीं हुई.गुनया के अनुसार असल समस्या यह थी कि उस समय शादियां अधिकतर परिवारों की मर्ज़ी से तय होती थीं और बहुत सी कम उम्र की लड़कियों की शादियां उनसे कहीं बड़े मर्दों से कर दी जाती थीं.
गुनया ने बताया कि उस समय तलाक़ नामुमकिन था. आप अलग नहीं हो सकते थे, चाहे आप पर कितना ही ज़ुल्म क्यों न हो या आपका शोषण ही क्यों न किया जाए.लेकिन उस ज़माने की रिपोर्ट्स यह भी बताती हैं कि घर वालों से तय की गई शादियों (अरेंज्ड मैरिज) के साथ एक तरह का समझौता भी होता था, जिसमें ज़मीन, विरासत और क़ानूनी ज़िम्मेदारियां शामिल होती थीं.
फ़ाज़कास ने महिलाओं को भरोसा दिलाना शुरू किया कि वह उनकी समस्याएं हल कर सकती हैं.
किसी मर्द को ज़हर देने की पहली घटना उनके आने के साथ ही 1911 में हुई थी. इसके बाद के वर्षों में पहले विश्व युद्ध के दौरान और ऑस्ट्रो-हंगरी साम्राज्य टूटने के साथ ऐसी घटनाएं बढ़ती गईं और अधिक मर्दों की हत्याएं होने लगीं.और इस तरह 18 वर्षों में 45 से 50 मर्दों की मौत हुई. यह मरने वाले किसी के पति थे तो किसी के पिता. उन सबको गांव के क़ब्रिस्तान में दफ़न किया गया.
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बहुत से लोगों ने नाग्यरेव को 'क़ातिलों का शहर' कहना शुरू कर दिया.
इन बातों पर पुलिस का ध्यान गया और 1929 की शुरुआत में लाशें क़ब्रों से निकाली गईं ताकि उनका मुआयना किया जा सके. उन लाशों में से एक ही सबूत मिला - 'आर्सेनिक'.
फ़ाज़कास गांव में एक आम-सी एक मंज़िला इमारत में रहती थीं, जिसका दरवाज़ा सड़क की ओर खुलता था. इस घर में उन्होंने कई ज़हरीले सॉल्यूशन तैयार किए, जो उन लोगों की हत्या में इस्तेमाल हुए.
आख़िरकार 19 जुलाई 1929 को पुलिस उन्हें पकड़ने पहुँची.
जब उन्होंने सिपाहियों को पास आते देखा तो वह समझ गईं कि उनका खेल ख़त्म हो चुका है. जब तक पुलिस वाले उनके घर पहुँचते, वह ख़ुद मर चुकी थीं. उन्होंने अपना ही बनाया ज़हर ख़ुद पी लिया था.
लेकिन यह दाई अकेली मुजरिम नहीं थी.
जब दूसरी महिलाओं के बारे में भी जानकारी मिली तो साल 1929 में ही पास के शहर सोज़नोक में 26 महिलाओं के ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाया गया.इनमें से आठ को मौत की सज़ा दी गई और बाक़ी को जेल भेजा गया. इनमें से सात को उम्रक़ैद दी गई. चूँकि बहुत कम महिलाओं ने अपना अपराध स्वीकार किया, इसलिए इस बात का सही से पता नहीं चल सका कि उनका मक़सद क्या था.
इस शहर के आर्काइव के इतिहासकार डॉक्टर गीज़ा चेख़ ने अदालती रिकॉर्ड्स के आधार पर बीबीसी से कहा कि आज भी बहुत से सवालों के जवाब नहीं मिले हैं.गीज़ा चेख़ ने कहा कि उन महिलाओं ने किन वजहों से हत्याएँ कीं, उनके बारे में कई मत हैं, जैसे ग़रीबी, लालच और उकताहट.
उन्होंने बताया कि कुछ रिपोर्ट्स में यह बात भी सामने आई कि कई महिलाओं के रूसी युद्धबंदियों से संबंध बन गए थे. इन युद्धबंदियों से खेतों में मज़दूरी करवाई जाती थी.जब उनके पति वापस आए तो उन औरतों को अचानक अपनी आज़ादी खो जाने का एहसास हुआ और इसीलिए उन्होंने ऐसा किया.
1950 के दशक में इतिहासकार फ़ेरेनेक गेरोगेव ने कम्यूनिस्ट शासन के तहत अपनी क़ैद के दौरान गांव के एक बूढ़े शख़्स से मुलाक़ात की.उस बूढ़े किसान ने दावा किया कि नाग्यरेव की महिलाएँ पुराने ज़माने से ही अपने मर्दों की हत्याएँ करती आ रही थीं.
पास के शहर तिस्ज़ाकुर्त में भी कुछ लाशें क़ब्रों से निकाली गईं, जिनमें आर्सेनिक पाया गया. लेकिन उन मौतों पर किसी को सज़ा नहीं दी गई. कुछ अनुमानों के अनुसार उस इलाक़े में आर्सेनिक से मरने वालों की कुल संख्या 300 तक पहुँच चुकी थी.
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