रायगढ़ : विश्वप्रसिद्ध चक्रधर समारोह के अंतर्गत आयोजित संगीत संध्या में पद्मश्री विदुषी अश्विनी भिड़े देशपांडे ने अपनी विलक्षण गायकी से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।कार्यक्रम का शुभारंभ उन्होंने राग गौड़ मल्हार से किया। विलंबित त्रिताल की पारंपरिक रचना “मानन करें गोरी तुम्हरे कारण आए मेघा” तथा मध्यलय त्रिताल की रचना “ऐसो कैसो आयो, बैरी बदरा मोरे पिय का संदेशवा नहीं लायो रे” प्रस्तुत कर उन्होंने वातावरण को रसपूर्ण बना दिया। इन रचनाओं में उनकी स्वर-साधना और भाव-संपन्नता का अद्भुत संगम दिखाई दिया।
इसके पश्चात विदुषी अश्विनी जी ने अपने स्वनिर्मित राग “प्रतीक्षा” की प्रस्तुति दी। कार्यक्रम में उन्होंने स्वयं इस राग का परिचय श्रोताओं को देते हुए बताया कि यह राग भूपाली में कोमल धैवत जोड़कर बनाया गया है, जिसे कुछ विद्वान “भूपेश्वरी” भी कहते हैं। इस राग में उन्होंने 7½ मात्रा की अनूठी ताल में रचित बंदिश “कारी बदरिया घेरी, पिया नहीं पास अब कैसे करूँ सखी री” प्रस्तुत की। विशेष उल्लेखनीय यह रहा कि उन्होंने श्रोताओं को इस ताल के ठेके के बोल भी समझाए।
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इसी राग प्रतीक्षा में उन्होंने मध्यलय त्रिताल की बंदिश “प्रीतम बिन लागे नाहीं जिया, ऋतु सावन की घटा घन अंधियारी, चमक रही बैरन बिजुरी” गाकर वातावरण को सरस बना दिया।
कार्यक्रम का समापन उन्होंने छत्तीसगढ़ की ख्यातिनाम ठुमरी गायिका विदुषी डॉ. श्रीमती अनीता सेन की स्मृति को समर्पित उपशास्त्रीय दादरा “बैरी बदरा काहे सताए, जाने कौन घड़ी सैयाँ आए” से किया। यह प्रस्तुति विशेष रूप से मार्मिक और भावपूर्ण रही, जिसे श्रोताओं ने बड़े ध्यान और भावविभोर होकर सुना।
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इस अवसर पर विदुषी अश्विनी भिड़े देशपांडे के साथ संगति में तबले पर यति भागवत ने सधी और सटीक संगति की, वहीं हारमोनियम पर ज्ञानेश्वर सोनानी ने अत्यंत समतुल्य और मधुर सहयोग दिया। उनकी शिष्या ऋतुजा लाड़ ने तानपुरा के साथ-साथ गायन में भी संगति कर कार्यक्रम को और समृद्ध बनाया। साथ ही, कमला देवी संगीत महाविद्यालय, रायपुर की छात्रा वर्षा चतुर्वेदी ने भी तानपुरा संगत कर महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान किया।
कार्यक्रम के समापन पर रायगढ़ सांसद देवेंद्र प्रताप सिंह जी एवं कलेक्टर महोदय ने विदुषी अश्विनी भिड़े देशपांडे का सम्मान श्रीफल और मोमेंटो भेंट कर किया।इस प्रकार चक्रधर समारोह की यह संध्या संगीत साधना, नवाचार और परंपरा के अद्भुत संगम के रूप में श्रोताओं के हृदय में अमिट छाप छोड़ गई।

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