धान की फसल पर मंडराता संकट किसानों की नींदें उड़ा रहा है. इस बार सबसे बड़ी चुनौती बनकर सामने आया है कंडुआ रोग, ये धान की बालियों को उस समय अपनी चपेट में लेता है जब वे फूल बनने की अवस्था में होती हैं.
तेज नमी और 25 से 35 डिग्री तापमान इस रोग को पनपने के लिए सबसे उपयुक्त माहौल प्रदान करते हैं. यही वजह है कि यह हवा के साथ तेजी से फैलता है और एक खेत से दूसरे खेत तक पहुँचकर पूरे इलाके की फसल को बर्बाद कर देता है.
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धान की खेती पर निर्भर किसानों के बीच इस रोग ने गहरी चिंता पैदा कर दी है. वे जानना चाहते हैं कि आखिर इसका समाधान क्या है और कैसे अपनी मेहनत की फसल को बचाया जाए.
विशेषज्ञों के मुताबिक कंडुआ रोग लगने पर धान की बालियों पर हरे-पीले या नारंगी रंग के फफूंद जैसे गोलाकार ढेले बनने लगते हैं. इन ढेलों के कारण दाने पूरी तरह से नष्ट हो जाते हैं और किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है.
अगर यह रोग समय रहते नियंत्रित न किया जाए तो धान का उत्पादन 20 से 30 प्रतिशत तक घट सकता है. खासतौर पर हाइब्रिड किस्में इस रोग की चपेट में ज्यादा आती हैं.
अगर फसल में कंडुआ रोग दिखाई दे तो सबसे पहले संक्रमित बालियों को खेत से हटाकर नष्ट करना जरूरी है.
यूरिया का छिड़काव बंद कर देना चाहिए और बालियों के शुरुआती अवस्था में टेबुकोनाज़ोल + ट्रायफ्लोक्सी स्ट्रोबिन जैसे फफूंदनाशकों का छिड़काव करना चाहिए.
विशेषज्ञों का कहना है कि भविष्य में इस रोग से बचने के लिए धान की बीजोपचार करना बेहद आवश्यक है. साथ ही ट्रांसप्लांटिंग के दौरान पौधों की जड़ों को कार्बेन्डाज़िम के घोल में डुबोकर रोपाई करने से फसल को कवकजन्य रोगों से सुरक्षित रखा जा सकता है.
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