धान की बालियाँ हरी-भरी होकर खेतों में लहरा रही हैं लेकिन इसी बीच किसानों के लिए एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है. खेतों में तेजी से इल्ली का प्रकोप फैल रहा है जो पौधों को कमजोर कर, फसल की गुणवत्ता के साथ-साथ पैदावार पर भी गंभीर असर डाल सकता है. शुरुआती लक्षणों में पत्तियों का कटा-फटा दिखना, पौधों का सफेद पड़ना और झुकना शामिल है. यदि समय रहते इसका इलाज नहीं किया गया तो बड़े नुकसान का खतरा बढ़ सकता है.
विशेषज्ञों की चेतावनी और सलाह
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि इल्ली का प्रकोप इस समय धान की सबसे बड़ी समस्या बनकर सामने आया है. इसकी रोकथाम के लिए जरूरी है कि किसान खेतों की लगातार निगरानी करें और जैसे ही लक्षण दिखाई दें तुरंत कार्रवाई करें. बीस वर्षों से बीज व्यापार में जुड़े अमित सिंह बताते हैं कि इल्ली की समस्या को हल्के में लेना किसानों के लिए खतरनाक हो सकता है. उनका कहना है कि हर कीट के लिए अलग दवा का उपयोग करना चाहिए और उसी अनुसार छिड़काव करना जरूरी है.
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कारगर कीटनाशक और उनके फायदे
इल्ली के नियंत्रण के लिए बाजार में कई कीटनाशक उपलब्ध हैं. विशेषज्ञ बताते हैं कि प्रोक्नोफास धान की फसल में विशेष रूप से कारगर है. यह कीटनाशक कीटों के तंत्रिका तंत्र पर असर डालकर उन्हें तुरंत मारता है जिससे फसल को दीर्घकालिक सुरक्षा मिलती है और उपज में वृद्धि होती है. इसके अलावा साइपरमेथ्रिन भी धान में इल्लियों के प्रकोप को नियंत्रित करने में प्रभावी साबित होता है. वहीं क्लोरोप्लस साइफर (क्लोरोपायरीफॉस 50% + साइपरमेथ्रिन 5% EC) जैसे मिक्चर कीटनाशक भी फसल को कीटों से बचाने और इल्ली के प्रकोप को कम करने के लिए उपयुक्त माने जाते हैं.
समय रहते करें छिड़काव
कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि समय पर जैविक या रासायनिक कीटनाशकों का छिड़काव करने से फसल को बड़े नुकसान से बचाया जा सकता है. किसान यदि शुरुआती संकेत पहचान लें और तुरंत दवाई डालें तो नुकसान को काफी हद तक रोका जा सकता है. धान की इस नाजुक अवस्था में लापरवाही करना किसानों के लिए भारी पड़ सकता है इसलिए सतर्कता और सही दवा का उपयोग ही सबसे बड़ा बचाव है.
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