स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर गंभीर खुलासा: कागज़ी गाड़ियों का बड़ा भंडाफोड़,ज़मीन पर एक भी नहीं!

स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर गंभीर खुलासा: कागज़ी गाड़ियों का बड़ा भंडाफोड़,ज़मीन पर एक भी नहीं!

महासमुंद : जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर एक गंभीर खुलासा सामने आया है। लाखों रुपये की लागत से खरीदी गई चार सरकारी बोलेरो गाड़ियाँ अनेक महीनों से मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) कार्यालय में धूल से ढकी खड़ी हैं, जबकि कागज़ों में इन्हें विभिन्न चिकित्सा अधिकारियों को सौंपा हुआ दिखाया गया है। आरोप यह भी है कि सीएमएचओ आई. नागेश्वर राव ने जिला कलेक्टर को इन वाहनों के वितरण के बारे में भ्रामक जानकारी दी है।

ये सभी बोलेरो वाहन संचालक स्वास्थ्य सेवाएँ, छत्तीसगढ़ द्वारा महासमुंद जिले को ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं को तेज़ और सुचारु बनाने के लिए प्रदान किए गए थे। परंतु वास्तविक स्थिति बेहद चौंकाने वाली है। तीन बोलेरो कार्यालय परिसर में टीनशेड के नीचे महीनों से जमी धूल की परतों के साथ खड़ी हैं, मानो किसी उपेक्षित प्रदर्शनी का हिस्सा हों। चौथे वाहन को लेकर यह चर्चा है कि उसे विभाग के एक बड़े अधिकारी द्वारा अपने निजी कार्यों में उपयोग किया जा रहा है।

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सूत्र बताते हैं कि कुछ दिन पहले जिला कलेक्टर ने इन वाहनों की वर्तमान स्थिति की जानकारी मांगी थी। सीएमएचओ की ओर से भेजी गई सूचना में कहा गया कि सभी गाड़ियाँ संबंधित चिकित्सा अधिकारियों को दे दी गई हैं। लेकिन जैसे ही ज़मीनी स्थिति की जाँच शुरू हुई, सारा दावा हवा हो गया। किसी भी विकासखंड में इन वाहनों का अता-पता नहीं मिला। न वाहन पहुँचे, न चाबियाँ, न किसी को औपचारिक रूप से सौंपे जाने का दस्तावेज़। कई स्वास्थ्य कर्मचारियों ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि “हो सकता है काग़ज़ में बाँट दिया गया हो, लेकिन हमें तो आज तक कोई वाहन मिला ही नहीं।” एक अधिकारी ने व्यंग्य करते हुए कहा कि “जिले में सरकारी गाड़ियाँ काग़ज़ों में दौड़ रही हैं, सड़कों पर नहीं।”

इस पूरी स्थिति का सीधा असर स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ रहा है। महासमुंद भौगोलिक रूप से विस्तृत जिला है, जहाँ दूर-दराज़ बसे गाँवों में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाएँ, टीकाकरण अभियान, कुपोषण निरीक्षण, मलेरिया जाँच और अन्य स्वास्थ्य कार्यक्रम वाहन के बिना लगभग ठप जैसे हो जाते हैं। कर्मचारी आज भी निजी मोटरसाइकिल या किराए के साधनों से गांवों तक पहुँचना पड़ रहा है, जिससे सेवाओं की गुणवत्ता और गति दोनों प्रभावित हो रही हैं।

स्वास्थ्यकर्मियों और सामाजिक संगठनों ने इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जाँच की मांग की है। उनका कहना है कि यदि जिला कलेक्टर चारों वाहनों के मीटर की रीडिंग की जाँच कराएँ, तो सच स्वयं सामने आ जाएगा। यदि यह सिद्ध होता है कि कलेक्टर को गलत जानकारी देकर गुमराह किया गया है, तो यह केवल विभागीय लापरवाही नहीं, बल्कि प्रशासनिक ईमानदारी को ठेस पहुँचाने वाला गंभीर मामला होगा।

अब पूरा ज़िला प्रशासनिक कार्रवाई की दिशा देख रहा है। सवाल यह है कि लाखों रुपये की ये सरकारी गाड़ियाँ कब तक धूल से लिपटी यूँ ही खड़ी रहेंगी और कब इनका उपयोग जनता की सेहत और सेवाओं को बेहतर बनाने में किया जाएगा।







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