राजनांदगांव : राजनांदगांव में इन दिनों सवाल विकास का नहीं, नगर निगम की नीयत का है। शहर की जमीन खेत से कॉलोनी बन रही है, प्लॉट बिक रहे हैं, सड़कें खिंच रही हैं—और नगर निगम ऐसे चुप है जैसे यह सब उसी की अनुमति से हो रहा हो।ममता नगर, जीवन कॉलोनी, गोकुल नगर के पीछे की जमीन, मोतीपुर नया ढाबा इलाका और कंचनबाग–सृष्टि कॉलोनी के पीछे का क्षेत्र आज अवैध कॉलोनियों की प्रयोगशाला बन चुका है। नियम कहते हैं—बिना अनुमति प्लॉटिंग अपराध है, लेकिन राजनांदगांव में यह अपराध खुलेआम और निर्भय होकर किया जा रहा है।
“पहले प्लॉट काटो, बाद में नक्शा बनाओ”
यहां प्लॉट बेचने वाले बेखौफ होकर कहते हैं—“जमीन ले लो, कागज़ बाद में ठीक हो जाएंगे।” सवाल यह है कि जब दलालों को इतना भरोसा है, तो उन्हें यह भरोसा किसकी चुप्पी से मिला?
नगर निगम कभी-कभी निरीक्षण का नाटक जरूर करता है—दूर से देखकर लौट आना, नोटिस दिखाना और फिर फाइल ठंडे बस्ते में डाल देना। न तो जमीन सील होती है, न मशीनें जब्त होती हैं, न ही जिम्मेदारों पर एफआईआर। कार्रवाई सिर्फ कमजोर लोगों तक सीमित रहती है।
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अवैध कॉलोनियों में न सड़क है, न नाली, न पानी और न ही ड्रेनेज की कोई योजना। फिर भी प्लॉट बिक रहे हैं, क्योंकि भरोसा है कि बाद में निगम ही सब संभाल लेगा—जैसा हर बार होता आया है।
शहर में अब लोग तंज कस रहे हैं कि राजनांदगांव में दो सिस्टम चल रहे हैं—
एक कानून का, जो किताबों में बंद है।
दूसरा प्लॉटिंग माफिया का, जो जमीन पर राज कर रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या नगर निगम की चुप्पी अक्षमता है या मिलीभगत?
और अगर यह सब नगर निगम की जानकारी में नहीं हो रहा, तो फिर निगम आखिर देख क्या रहा है?
शहरवासी मांग कर रहे हैं कि अवैध कॉलोनियों पर तुरंत बुलडोजर चले, जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई हो और यह साफ किया जाए कि नगर निगम जनता के साथ है या अवैध प्लॉटिंग माफिया के साथ।

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