भोरमदेव अभ्यारण में खून से सनी हरी धरती:अवैध करंट से दो दुर्लभ बाइसन की निर्मम हत्या, वन सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल

भोरमदेव अभ्यारण में खून से सनी हरी धरती:अवैध करंट से दो दुर्लभ बाइसन की निर्मम हत्या, वन सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल


कवर्धा | टेकेश्वर दुबे : छत्तीसगढ़ के कवर्धा जिले स्थित भोरमदेव वन्यजीव अभ्यारण से वन संरक्षण व्यवस्था को झकझोर देने वाली एक अत्यंत गंभीर और शर्मनाक घटना सामने आई है। बोड़ला विकासखंड के अंतर्गत धवईपानी बिट के धवईपानी क्षेत्र में शिकारियों ने जंगल में अवैध रूप से विद्युत करंट बिछाकर दो दुर्लभ एवं संरक्षित इंडियन बाइसन (गौर) की बेरहमी से हत्या कर दी। इस घटना ने न केवल वन विभाग में हड़कंप मचा दिया है, बल्कि राज्य की वन्यजीव सुरक्षा व्यवस्था की पोल भी खोल दी है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, शिकारियों ने सुनियोजित तरीके से जंगल क्षेत्र में करंट युक्त तार बिछाकर इन विशालकाय और संरक्षित वन्य प्राणियों को निशाना बनाया। करंट की चपेट में आते ही दोनों बाइसन की मौके पर ही दर्दनाक मौत हो गई। घटना की सूचना मिलते ही वन मंडल अधिकारी सहित विभागीय अमला मौके पर पहुंचा और क्षेत्र की घेराबंदी कर जांच प्रारंभ की गई।

फोरेंसिक और डॉग स्क्वॉड तैनात, संदिग्ध हिरासत में

मामले की गंभीरता को देखते हुए वन विभाग ने फोरेंसिक टीम और डॉग स्क्वॉड को जांच में शामिल किया है। प्रारंभिक जांच के आधार पर दो संदिग्धों को हिरासत में लेकर पूछताछ की जा रही है। विभाग को आशंका है कि यह वारदात किसी संगठित शिकार गिरोह द्वारा अंजाम दी गई है, जो लंबे समय से अभ्यारण क्षेत्र में सक्रिय हो सकता है।

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दो महीनों में चार बाइसन की मौत, गश्त पर सवाल

सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि पिछले मात्र दो महीनों में चार बाइसन की मौत हो चुकी है। करीब एक माह पूर्व भोरमदेव अभ्यारण परिक्षेत्र चिल्फी के बहनखोदारा–सालेहवारा क्षेत्र में भी करंट से दो बाइसन की जान गई थी। लगातार हो रही इन घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अभ्यारण क्षेत्र में गश्त, निगरानी और विभागीय दबाव पूरी तरह कमजोर पड़ चुका है।

करोड़ों के बजट के बावजूद सुरक्षा नाकाम

करोड़ों रुपये के बजट, योजनाओं और संसाधनों के बावजूद संरक्षित वन क्षेत्र में इस तरह की घटनाओं का दोहराव होना वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। वन्यजीव प्रेमियों और पर्यावरण संगठनों में इस घटना को लेकर भारी आक्रोश है। विशेषज्ञों का कहना है कि इंडियन बाइसन जैसे दुर्लभ और संरक्षित वन्य प्राणी का शिकार जैव विविधता के लिए अपूरणीय क्षति है, जिसकी भरपाई किसी भी स्तर पर संभव नहीं है।

जवाबदेही तय होगी या अभ्यारण यूं ही लुटता रहेगा?

हालांकि वन विभाग का दावा है कि जल्द ही अपराधियों तक पहुंचकर कड़ी कार्रवाई की जाएगी, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिन बाइसन की जान जा चुकी है, उनकी भरपाई कौन करेगा? क्या बार-बार हो रही इन घटनाओं के बाद भी अभ्यारण की सुरक्षा व्यवस्था में कोई ठोस सुधार होगा, या फिर भोरमदेव अभ्यारण यूं ही शिकारियों के लिए खुला मैदान बना रहेगा?यह मामला अब केवल वन्यजीव शिकार तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि वन संरक्षण व्यवस्था की विफलता और जवाबदेही तय करने की राष्ट्रीय आवश्यकता बन चुका है।







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