गरियाबंद में राम भरोसे बन रहा 23 करोड़ का अस्पताल: जहाँ इंसानों की जान सस्ती और कागजी दावे महंगे हैं

गरियाबंद में राम भरोसे बन रहा 23 करोड़ का अस्पताल: जहाँ इंसानों की जान सस्ती और कागजी दावे महंगे हैं

गरियाबंद : कहते हैं कि अस्पताल बीमारों को जीवन देने के लिए बनाए जाते हैं, लेकिन गरियाबंद में CGMSC (छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कॉर्पोरेशन) की देखरेख में बन रहा 'क्रिटिकल केयर हेल्थ ब्लॉक' फिलहाल खुद ही 'क्रिटिकल कंडीशन' में है। यहाँ सुरक्षा के नियम शायद केवल फाइलों में दबे पड़े हैं, क्योंकि निर्माण स्थल पर मौत और दुर्घटनाएं चार मंजिला इमारत की सीढ़ियों पर बिना किसी रोक-टोक के घूम रही हैं।

उद्घाटन का 'शाही' शोर, सुरक्षा का 'सन्नाटा'

सितंबर 2023 में जब देश के प्रधानमंत्री और तत्कालीन दिग्गजों ने इस 23.75 करोड़ के प्रोजेक्ट का शिलान्यास किया था, तब लगा था कि गरियाबंद को आधुनिक स्वास्थ्य सेवा मिलेगी। लेकिन आज, निर्माण एजेंसी CGMSC और ठेकेदार M/s- Shree Ji Krupa Project Ltd की 'कृपा' से यहाँ सुरक्षा के नाम पर केवल शून्य बिखरा पड़ा है।

'अदृश्य' हेलमेट और 'काल्पनिक' सेफ्टी नेट

हमारे मीडिया दल ने 1 दिसंबर को दौरा किया और फिर 23 दिसंबर को दोबारा पड़ताल की। नतीजा वही—'ढाक के तीन पात'। चार मंजिला इमारत पर श्रमिक मौत को ठेंगा दिखाकर काम कर रहे हैं। न सिर पर हेलमेट, न पैरों में सुरक्षा जूते, और न ही वो 'ग्रीन सेफ्टी नेट' जो गिरते हुए मलबे या इंसान को बचा सके।

शायद ठेकेदार और इंजीनियरों को लगता है कि छत्तीसगढ़ के श्रमिक 'सुपरमैन' हैं, जिन्हें न ऊंचाई से डर लगता है और न ही सिर पर गिरती ईंटों से। PPE (पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट) जैसे शब्द यहाँ के निर्माण स्थल के लिए शायद किसी दूसरे ग्रह की भाषा हैं।

अधिकारियों का 'जादुई' चश्मा

जब इस लापरवाही पर CGMSC के सब-इंजीनियर मुकेश साहू से बात की गई, तो उनका जवाब किसी जादू से कम नहीं था। उन्होंने फोन पर दावा किया कि "सभी सुरक्षा उपकरण उपलब्ध हैं।" अब सवाल यह है कि क्या वे उपकरण केवल साहब की आँखों को दिखते हैं या उन्होंने कोई 'मिस्टर इंडिया' वाली घड़ी श्रमिकों को पहना रखी है? ग्राउंड जीरो पर मौजूद मीडिया की टीम और कैमरों को तो वहां एक भी दस्ताना तक नसीब नहीं हुआ।

वहीँ, श्रम पदाधिकारी श्रीमती जयंती बंसल ने मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच और कार्रवाई का आश्वासन दिया है। अब देखना यह है कि यह जांच 'कागजी घोड़ों' तक सीमित रहती है या वास्तव में श्रमिकों को उनका हक और सुरक्षा मिलती है।

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BOCW अधिनियम की धज्जियां

कानूनन, Building and Other Construction Workers (BOCW) Act के तहत हर श्रमिक को सुरक्षा उपकरण और प्रशिक्षण देना अनिवार्य है। लेकिन गरियाबंद का यह प्रोजेक्ट चीख-चीख कर कह रहा है कि यहाँ सिर्फ 'बजट' की सुरक्षा सर्वोपरि है, 'बनाने वाले' की नहीं। बिना फायर एक्सटिंग्विशर, फर्स्ट-एड किट और चेतावनी संकेतों के यह कार्यस्थल किसी बड़े हादसे का निमंत्रण कार्ड जैसा लग रहा है।

एक तरफ सरकार 'श्रमेव जयते' का नारा देती है, वहीं दूसरी तरफ करोड़ों के सरकारी प्रोजेक्ट्स में सुरक्षा मानकों को ठेकेदार के मुनाफे की भेंट चढ़ा दिया जाता है। CGMSC जैसी जिम्मेदार एजेंसी की नाक के नीचे चल रही यह लापरवाही दर्शाती है कि सिस्टम की जवाबदेही कितनी 'पारदर्शी' है। क्या प्रशासन किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार कर रहा है? या फिर 'साहब' और 'ठेकेदार' की जुगलबंदी में सुरक्षा के नियम सिर्फ एक औपचारिकता बनकर रह गए हैं?







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