रायपुर : छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर स्थित विशेष सत्र न्यायालय ने एक गंभीर आपराधिक मामले में कड़ा और उदाहरणात्मक फैसला सुनाया है। विशेष सत्र प्रकरण क्रमांक 29/2025 में न्यायालय ने अभियुक्त कृष्णा तिवारी को भारतीय न्याय संहिता, 2023 एवं अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत दोषी पाते हुए आजीवन कारावास सहित कुल 20 वर्ष की कठोर कारावास की सजा सुनाई है। अदालत के आदेश के बाद दोषी को केन्द्रीय जेल रायपुर भेजने का वारंट जारी कर दिया गया है।
यह मामला थाना अजाक, रायपुर में दर्ज अपराध क्रमांक 05/2025 से संबंधित है। प्रकरण की सुनवाई विशेष न्यायाधीश पंकज कुमार सिन्हा, विशेष न्यायालय (एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम), रायपुर द्वारा की गई। न्यायालय ने विस्तृत साक्ष्यों, गवाहों के बयान एवं अभियोजन पक्ष की दलीलों के आधार पर अभियुक्त को दोषसिद्ध माना। अदालत के आदेश के अनुसार अभियुक्त कृष्णा तिवारी पिता स्वर्गीय होरीलाल तिवारी, उम्र 36 वर्ष, निवासी गली नंबर 03, सुमित्रा विहार, मंगला चौक, बिलासपुर को भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 64 के तहत 10 वर्ष का कठोर कारावास एवं 2,000 रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई गई है। इसके अतिरिक्त, धारा 69 के अंतर्गत भी 10 वर्ष का कठोर कारावास तथा 2,000 रुपये का अर्थदंड लगाया गया है।
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सबसे गंभीर आरोप अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 3(2)(v) के अंतर्गत सिद्ध होने पर न्यायालय ने अभियुक्त को आजीवन कारावास तथा 2,000 रुपये अर्थदंड से दंडित किया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि अभियुक्त को दी गई सभी कारावास की सजाएं साथ-साथ (Concurrent) भुगताई जाएंगी। न्यायालय ने यह भी आदेश दिया है कि यदि अभियुक्त अर्थदंड की राशि अदा करने में विफल रहता है, तो प्रत्येक 2,000 रुपये के अर्थदंड के बदले उसे दो माह का अतिरिक्त कठोर कारावास भुगतना होगा। साथ ही, प्रकरण की जांच एवं विचारण के दौरान अभियुक्त द्वारा न्यायिक हिरासत में बिताई गई अवधि को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 468 के प्रावधानों के तहत सजा की अवधि में समायोजित (मुजरा) किया जाएगा।
अदालत द्वारा जारी वारंट में केन्द्रीय जेल अधीक्षक, रायपुर को निर्देशित किया गया है कि दोषी अभियुक्त को वारंट के साथ अपनी हिरासत में लेकर विधि अनुसार सजा की तामीली सुनिश्चित की जाए। सजा की पूरी तामीली के पश्चात जेल प्रशासन को वारंट पर विधिवत रिपोर्ट अंकित कर उसे न्यायालय में वापस प्रस्तुत करने के निर्देश भी दिए गए हैं। इस निर्णय को न्यायिक हलकों में एक महत्वपूर्ण और सख्त संदेश के रूप में देखा जा रहा है। विशेषकर अनुसूचित जाति एवं जनजाति वर्ग के विरुद्ध होने वाले जघन्य अपराधों में कड़ी सजा देकर न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ऐसे अपराधों में किसी भी प्रकार की नरमी नहीं बरती जाएगी। यह फैसला न केवल पीड़ित को न्याय दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण है, बल्कि समाज में कानून के प्रति विश्वास और अपराधियों के लिए कड़ा संदेश भी देता है।

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