आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तानी,आय का दो-तिहाई भोजन और बिजली पर खर्च

आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तानी,आय का दो-तिहाई भोजन और बिजली पर खर्च

नई दिल्ली :  गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहे पड़ोसी देश पाकिस्तान में लोगों के लिए 'आमदनी अठन्नी, खर्चा रुपैया' वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। आवश्यक वस्तुओं की आसमान छूती कीमतें और आर्थिक कुप्रबंधन के परिणामस्वरूप लोगों को अपनी पारिवारिक जरूरतों को पूरा करने के लिए अब अपनी प्राथमिकताओं को बदलने के लिए विवश होना पड़ रहा है।

बढ़ती महंगाई का आलम यह है कि लोग अब अपनी कमाई का लगभग दो-तिहाई हिस्सा खाने और बिजली जैसी जरूरी चीजों पर खर्च कर रहे हैं। इससे शिक्षा, स्वास्थ्य या दीर्घकालिक जीवन सुरक्षा के लिए इंतजाम करने की बहुत ही कम गुंजाइश बच पा रही है।

हाउसहोल्ड इंटीग्रेटेड इकनामिक सर्वे ने पेश की यह धूमिल तस्वीर

द एक्सप्रेस ट्रिब्यून के अनुसार, इस हफ्ते जारी किए गए हाउसहोल्ड इंटीग्रेटेड इकनामिक सर्वे 2024-25 में यह धूमिल तस्वीर सामने आई है कि महंगाई और आर्थिक कुप्रबंधन ने घरों की प्राथमिकताओं को कैसे बदल दिया है। देश का गहराता आर्थिक संकट परिवारों को मुश्किल में डाल रहा है। लगातार बढ़ती कीमतों, दैनिक उपयोग की आवश्यक वस्तुओं पर अधिक टैरिफ और जीवन यापन की लागत में वृद्धि के कारण अब आमदनी से ज्यादा तेजी से खर्च बढ़ रहा है।

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महंगाई दर दो अंकों में पहुंची

जीवन यापन लागत में वृद्धि सर्वे से पता चलता है कि पाकिस्तानी परिवार अब अपने कुल खर्च का लगभग 63 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ दो चीजों पर खर्च करते हैं - खाना और घर से जुड़े खर्च, जिसमें बिजली और गैस शामिल हैं। घर के खर्च का 37 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ खाने पर खर्च होता है, जबकि घर में अन्य मदों पर 26 प्रतिशत खर्च होता है। महंगाई दर दो अंकों में पहुंच चुकी है और जीवन यापन की लागत में वृद्धि इसके गंभीर असर को प्रतिबिंबित करता है।

बजट का सिर्फ ढाई प्रतिशत ही शिक्षा पर खर्च करते लोग

सर्वे में कई ऐसे नतीजे सामने आए जो बेहद चिंताजनक थे। उनमें से एक यह भी था कि शिक्षा पर खर्च में तेजी से कमी आई है। लोग अब अपने बजट का सिर्फ ढाई प्रतिशत ही शिक्षा पर खर्च करते हैं, जो घर में अन्य मदों पर होने वाले खर्च के आधे से भी कम है। शिक्षा, स्वास्थ्य और मनोरंजन पर कुल खर्च सिर्फ सात प्रतिशत पर ही अटका हुआ है, जिससे मानव विकास को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा हो रही हैं।

सर्वे में विदेश से भेजे गए धन (रेमिटेंस) और अनौपचारिक मदद पर बढ़ती निर्भरता का भी उल्लेख किया गया है। परिवारों की कमाई में रेमिटेंस का हिस्सा बढ़कर लगभग आठ प्रतिशत हो गया है, जो छह साल पहले पांच प्रतिशत से कम था। जबकि, तोहफे और बाहरी मदद दोगुनी से ज्यादा हो गई है।

ग्रामीण परिवारों की रेमिटेंस पर और भी बढ़ी निर्भरता द एक्सप्रेस ट्रिब्यून के अनुसार, ग्रामीण परिवार जिन्हें रोजगार के कम मौके मिलते हैं, वे रेमिटेंस पर और भी ज्यादा निर्भर रहते हैं। विशेषज्ञ इसे सिकुड़ती घरेलू अर्थव्यवस्था का लक्षण बताते हैं। हालांकि, पिछले छह वर्षों में औसत मासिक आय बढ़ी है, जो लगभग 41,500 पाकिस्तानी रुपये से बढ़कर 82,000 रुपये से ज्यादा हो गई है। लेकिन, खर्च और भी तेजी से बढ़ा है।

खर्च में हर साल लगभग 19 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है, जो आय में वृद्धि से ज्यादा है और यह लोगों की खरीदने की क्षमता को कम कर रहा है। आमदनी में असमानता भी तेजी से बढ़ी है, जिसमें सबसे अमीर 20 प्रतिशत लोग सबसे गरीब 20 प्रतिशत लोगों से तीन गुना ज्यादा कमाते हैं।








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