जब सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करते हैं तब मकर संक्रांति पर्व मनाया जाता है। ये पर्व बसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक होता है। इस त्योहार से दिन लंबे होने लगते हैं और रातें छोटी। इस दिन सूर्य उत्तरायण होता है। पंजाब और जम्मू-कश्मीर में इस पर्व को लोहड़ी (Lohri) के नाम से मनाया जाता है तो तमिलनाडु में ये त्योहार पोंगल (Pongal) के नाम से मनाते हैं। वहीं उत्तर-प्रदेश और बिहार में इस पर्व को खिचड़ी पर्व (Khichdi) के नाम से मनाया जाता है। मकर संक्रांति पर दही चूड़ा और खिचड़ी खाने की विशेष परंपरा है। लेकिन अब सवाल ये आता है कि इस बार ये पर्व किस दिन मनाया जाएगा 14 या फिर 15 जनवरी? तो आपको बता दें इस साल मकर संक्रांति 14 जनवरी को ही मनाई जाएगी क्योंकि इसी दिन दोपहर 3 बजकर 13 मिनट पर सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश कर रहे हैं। आगे जानेंगे मकर संक्रांति का पुण्य काल समय और इसका महत्व।
मकर संक्रान्ति 2026 तिथि व पुण्य काल
मकर संकांति शुभ रंग
इस बार मकर संक्रांति का नाम मन्दाकिनी है और शुभ रंग पीला है। वहीं वाहन व्याघ्र और उपवाहन अश्व है।
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मकर संक्रांति क्यों मनाई जाती है
सूर्य के मकर राशि में प्रवेश को मकर संक्रांति के नाम से भी जाना जाता है। सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करते ही खरमास या धनुर्मास भी समाप्त हो जाता है। खरमास के समाप्त होते ही शुभ कार्यों की फिर से शुरुआत हो जाती है। सूर्य के किसी भी संक्रांति के पुण्यकाल के दौरान दान और स्नान का विशेष महत्व होता है। इस दौरान विशेष रूप से काष्ठ यानि लकड़ी और अन्न दान करने का महत्व है, जबकि स्नान की बात करें, तो मकर संक्रांति के दिन विशेष रूप से गंगा नदी में स्नान का महत्व है। साथ ही इस दिन काशी में दशाश्वमेध घाट पर या प्रयाग में स्नान करके भी पुण्यफल पाये जा सकते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मकर संक्रांति से सूर्य देव उत्तर दिशा की ओर गतिमान होते हैं जिसे अत्यंत शुभ माना गया है। इस दिन तिल, गुड़, खिचड़ी, वस्त्र और कंबल का दान अत्यंत शुभ माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि मकर संक्रांति पर किया गया दान दरिद्रता दूर करता है।
एक कथा के अनुसार असुरों पर भगवान विष्णु की विजय के तौर पर भी मकर संक्रांति पर्व मनाने की शुरुआत हुई। ऐसी मान्यता है कि मकर संक्रांति के दिन ही भगवान विष्णु ने पृथ्वी लोक पर असुरों का संहार किया था और उनके सिरों को मंदरा पर्वत पर गाड़ दिया था। कहते हैं तभी से इस दिन मकर संक्रांति पर्व के तौर पर मनाया जाने लगा।

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