पारंपरिक खेती से कमाई नहीं हो पा रही और अगर सीमित भूमि में बेहतर उत्पादन करना चाहते हैं, तो किसान मचान विधि से खेती कर सकते हैं. खेती में उत्पादन बढ़ाने और सीमित भूमि का बेहतर उपयोग करने के लिए मचान विधि को बेहद प्रभावी तकनीक माना जाता है. जमुई के किसान कुमोद कुमार ने इसी विधि से पहले खीरा और अब उसी मचान पर सेम की खेती की है. कुमोद बताते हैं कि मचान विधि में जमीन के ऊपर लकड़ी, बांस, लोहे की रॉड या तार के सहारे एक मजबूत ढांचा तैयार किया जाता है.
इसी ढांचे पर पौधों को चढ़ाया जाता है ताकि वे जमीन पर फैलने के बजाय ऊपर की ओर बढ़ें. यह विधि खासतौर पर करेला, लौकी, तोरई, कद्दू, खीरा, परवल, नेनुआ और टमाटर जैसी फसलों के लिए उपयोगी मानी जाती है. मचान पर उगाई गई फसलों को भरपूर धूप और हवा मिलती है, जिससे रोग लगने की संभावना कम होती है और उत्पादन की गुणवत्ता बेहतर होती है. इसके अलावा फल जमीन से ऊपर रहने के कारण सड़ने से बचते हैं और बाजार में इनकी कीमत भी अच्छी मिलती है.
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बेहद आसान है इसका इस्तेमाल
कुमोद बताते हैं कि मचान विधि का इस्तेमाल करना बेहद आसान है. सबसे पहले खेत या बगीचे में उपयुक्त दूरी पर मजबूत खंभे गाड़े जाते हैं, जिनकी ऊंचाई आमतौर पर 6 से 8 फीट रखी जाती है. इसके बाद खंभों के ऊपर तार, रस्सी या बांस को आड़ा-तिरछा बांधकर जाल जैसा ढांचा तैयार किया जाता है. पौधों को शुरुआती अवस्था में सहारे से बांधा जाता है ताकि वे मचान पर चढ़ सकें. एक बार मचान तैयार हो जाने के बाद उसी ढांचे पर कई बार फसल ली जा सकती है. सामान्य तौर पर एक मजबूत मचान से 2 से 3 सीजन तक खेती की जा सकती है, बशर्ते उसकी देखभाल ठीक से की जाए. कुमोद बताते हैं कि एक ही मचान पर अलग-अलग मौसम में विभिन्न बेल वाली फसलों की खेती कर सकते हैं, जिससे लागत कम होती है और मुनाफा बढ़ता है.
इन बातों का रखना चाहिए विशेष ध्यान
कुमोद ने बताया कि मचान बनाते समय कुछ अहम बातों का ध्यान रखना बेहद जरूरी होता है. ढांचा इतना मजबूत होना चाहिए कि फसल का भार और तेज हवा दोनों को सह सके. कमजोर मचान टूटने का खतरा रहता है, जिससे पूरी फसल बर्बाद हो सकती है. मचान की दिशा इस तरह रखें कि फसल को अधिकतम धूप मिले. खेत में जल निकासी की उचित व्यवस्था होनी चाहिए ताकि बारिश के मौसम में जड़ों में पानी न रुके. समय-समय पर मचान की जांच कर ढीले तार या बांस को ठीक करते रहना चाहिए. पौधों की नियमित कटाई-छंटाई से मचान पर भार संतुलित रहता है और रोग फैलने से बचाव होता है.
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