नई दिल्ली : दुनिया की नजरें अब मिडिल ईस्ट और साउथ एशिया पर टिकी हैं। सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच साइन हुआ एक डिफेंस पैक्ट अब तुर्किए को शामिल करने की कगार पर है। यह पैक्ट नाटो की तरह काम करेगा और इसमें किसी एक सदस्य पर हमला पूरे ग्रुप पर हमला माना जाएगा। इसे कई लोग 'इस्लामिक नाटो' या 'मुस्लिम नाटो' कह रहे हैं।
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, बातचीत काफी आगे बढ़ चुकी है और जल्द ही डील हो सकती है। यह बदलाव इसलिए अहम है क्योंकि इसमें सऊदी अरब का खजाना, पाकिस्तान का न्यूक्लियर हथियार और तुर्किए की मजबूत मिलिट्री पावर एक साथ आ रही है। भारत इस डील पर गहरी नजर रख रहा है।
यह पैक्ट सितंबर 2025 में सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच साइन हुआ था। इसमें साफ लिखा है कि किसी एक देश पर कोई आक्रमण दूसरे पर भी हमला समझा जाएगा। यह क्लॉज नाटो के आर्टिकल 5 जैसा है, जो तुर्किए पहले से ही फॉलो करता है क्योंकि वह नाटो का सदस्य है। अब तुर्किए इस पैक्ट में शामिल होने की कोशिश कर रहा है। अगर तुर्किए इसमें शामिल होता है तो यह तीन देशों का डिफेंस ब्लॉक बन सकता है।
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तीन देशों की भूमिका साफ
'इस्लामिक नाटो' बनने से पहले सभी देशों की भूमिका लगभग पहले से ही तय है। यानी सऊदी अरब फाइनेंशियल बैकिंग देगा, यानी पैसे की कोई कमी नहीं होगी। पाकिस्तान अपना न्यूक्लियर डिटरेंट, बैलिस्टिक मिसाइल और बड़ी संख्या में सैनिक देगा। वहीं तुर्की अपनी मिलिट्री एक्सपर्टीज, होमग्रोन डिफेंस इंडस्ट्री और एडवांस्ड टेक्नोलॉजी लाएगा।
तुर्किए पहले से ही पाकिस्तान के लिए कॉर्वेट वॉरशिप बना रहा है। इसके अलावा उसके पुराने एफ-16 जेट्स को अपग्रेड कर चुका है और दोनों देशों के साथ ड्रोन टेक्नोलॉजी शेयर कर रहा है। तुर्किए ने पाकिस्तान और सऊदी अरब को अपने फिफ्थ जेनरेशन फाइटर जेट प्रोग्राम 'कान' में शामिल होने का न्योता भी दिया है।
पहले से बढ़ रही है कोऑर्डिनेशन
ये तीनों देश पहले से ही करीब आ रहे हैं। तुर्किए की डिफेंस मिनिस्ट्री के मुताबिक, इस हफ्ते अंकारा में तीनों देशों की पहली नेवल मीटिंग हुई। यह उनकी नौसेनाओं के बीच सहयोग की शुरुआत है। साउथ एशिया, मिडिल ईस्ट और अफ्रीका के कुछ हिस्सों में इनकी स्ट्रैटेजिक इंटरेस्ट अब एक जैसी हो रही हैं।
खासकर ईरान को लेकर सऊदी अरब और तुर्किए दोनों चिंतित हैं। तीनों ही स्थिर सुन्नी-लीड सीरिया चाहते हैं और फिलिस्तीन को राज्य का दर्जा देने की बात करते हैं। इस सर्कल में ईरान इकलौता शिया बहुल देश है।
अमेरिका की पॉलिसी से बदल रही है दुनिया
इस गठबंधन के पीछे एक बड़ी वजह अमेरिका की बदलती प्राथमिकताएं हैं। अमेरिका अब अपने और इजरायल के इंटरेस्ट पर ज्यादा फोकस कर रहा है। ऐसे में क्षेत्रीय देश नए दोस्त और दुश्मन तय करने के लिए ऐसे मैकेनिज्म बना रहे हैं।
तुर्किए नाटो का दूसरा सबसे बड़ा मिलिट्री वाला देश है, उसके पास अमेरिकी हथियार भी हैं, लेकिन अब वह सऊदी-पाकिस्तान के साथ मिलकर नए रास्ता तलाश रहा है। यह शिफ्ट रीजनल पावर बैलेंस को भी पूरी तरह बदल सकता है।
हालांकि एक कंफ्यूजन ये भी कि इसमें संयुक्त अरब अमीरात, कतर, इराक के साथ किस तरह से संतुलन साधा जा सकता है। जैसा ही हाल में देखा गया कि यमन में गृहयुद्ध को लेकर सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात आमने-सामने आ गए थे।
भारत के लिए क्या मायने?
भारत के लिए ये गुटबंदी खासतौर पर अहम है। मई 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच चार दिनों का तनाव हुआ था, जिसे भारत ने ऑपरेशन सिंदूर नाम दिया। यह तनाव अप्रैल में पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद शुरू हुआ था, जिसमें 26 निर्दोष लोग मारे गए थे। भारत ने पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों पर स्ट्राइक कीं, पाकिस्तान ने जवाबी कार्रवाई की और फिर सीजफायर हो गया था।
इस दौरान तुर्किए ने पाकिस्तान का खुलकर साथ दिया था। अब जब तुर्किए, पाकिस्तान और सऊदी अरब मिलकर ऐसा गठबंधन बना रहे हैं, तो भारत इसे अपनी सिक्योरिटी के लिहाज से गंभीरता से ले रहा है।

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