गरियाबंद : छत्तीसगढ़ के धार्मिक और सांस्कृतिक मानचित्र में विशेष स्थान रखने वाला राजिम त्रिवेणी संगम आज अपनी बदहाली पर मानो आँसू बहा रहा है। जिस संगम पर श्रद्धालु आस्था की डुबकी लगाकर पुण्य लाभ अर्जित करते हैं, वहीं आज गंदगी का अंबार पसरा हुआ है। पैरी, सोंढूर और महानदी—तीन पावन नदियों के संगम स्थल को छत्तीसगढ़ का प्रयाग कहा जाता है, लेकिन दुर्भाग्यवश यही पवित्र धरोहर आज उपेक्षा और प्रदूषण की मार झेल रही है। हर साल होने वाले राजिम कुंभ को अब कुछ ही दिन शेष है, इसकी अब तैयारियां भी शुरू हो गई है।

आरोप है कि स्थानीय निस्तारी का गंदा पानी और राइस मिलों से निकलने वाला दूषित अपशिष्ट बेधड़क नदियों में छोड़ा जा रहा है। इसका सीधा असर संगम के जल पर पड़ रहा है। पानी दूषित हो चुका है और बदबू के कारण श्रद्धालुओं को स्नान करना तक मुश्किल हो गया है। कई श्रद्धालुओं ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि, “आस्था के इस केंद्र में गंदगी देखकर मन आहत होता है।”

राजिम त्रिवेणी संगम केवल स्नान स्थल ही नहीं, बल्कि सदियों पुराने भगवान श्री राजीवलोचन और भगवान कुलेश्वरनाथ महादेव के मंदिरों के कारण भी छत्तीसगढ़ में आस्था का बड़ा केंद्र है। यहां पर्यटन, मृतात्मा की शांति पूजन और अस्थि विसर्जन के लिए रोजाना हजारों लोग पहुंचते हैं। इसके बावजूद संगम क्षेत्र में घास–फूस, काई और झाड़ियां उग आई हैं, जो प्रशासनिक उदासीनता को उजागर करती हैं।

सालों से यहां राजिम कुंभ कल्प जैसे बड़े धार्मिक मेले का आयोजन किया जा रहा है, जिसे सरकारी प्रयासों से राष्ट्रीय स्तर का स्वरूप मिला है। बावजूद इसके, महानदी और त्रिवेणी संगम के दीर्घकालीन संरक्षण को लेकर कोई ठोस और प्रभावी कार्ययोजना नजर नहीं आती। हैरानी की बात यह है कि इतनी बड़ी धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक महत्व के बावजूद महानदी के संरक्षण को लेकर समाज और प्रशासनिक स्तर पर सबसे कम आवाज़ें उठती हैं।
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हालांकि महानदी की सफाई के लिए समिति गठित की गई है, इसको लेकर राजिम विधायक रोहित साहू ने बैठक भी की थी। जिससे अब उम्मीद जताई जा रही है कि आने वाले दिनों में साफ–सफाई व स्वच्छता को लेकर एक बेहतर कार्ययोजना बनाई जाएगी। लेकिन त्रिवेणी संगम की मौजूदा स्थिति को देखकर हर कोई हैरान है। सवाल यह है कि क्या आस्था के नाम पर नदियों को यूं ही गंदा किया जाता रहेगा? कब जागेगा प्रशासन और कब समाज अपनी जिम्मेदारी समझेगा, ताकि राजिम त्रिवेणी संगम फिर से अपनी पवित्र पहचान और गरिमा को प्राप्त कर सके?
यह सिर्फ प्रशासन की नहीं, बल्कि हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है कि इस अमूल्य धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर को प्रदूषण से मुक्त कर आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखें। जन जागरूकता और सख्त कार्रवाई के बिना यह संकट और गहराता जाएगा—और तब शायद पछतावे के सिवा कुछ नहीं बचेगा।
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