पहाड़ी इलाकों में प्याज की अच्छी पैदावार के पीछे देसी और पारंपरिक खेती के तरीके सबसे बड़ा राज माने जाते हैं. सही मिट्टी की तैयारी, पौधों के बीच उचित दूरी, संतुलित सिंचाई और जैविक खाद के इस्तेमाल से कम जगह में भी मोटी और स्वादिष्ट प्याज उगाई जा सकती है. इस खबर में हम कुछ ऐसे खास तरीके जानेंगे जिनसे आप अपने प्याज की फसल से बेहतर पैदावार पा सकते हैं.
पहाड़ी इलाकों में प्याज की अच्छी फसल का पहला राज सही मिट्टी की तैयारी मानी जाती है. यहां किसान खेत या किचन गार्डन की मिट्टी में पहले से सड़ी हुई गोबर की खाद मिलाते हैं. इसके साथ लकड़ी की राख डालना भी एक पुराना तरीका है, जिससे मिट्टी भुरभुरी बनी रहती है. भुरभुरी मिट्टी में प्याज का बल्ब आसानी से फैलता है और आकार में मोटा होता है. किचन गार्डन में गमले या बेड तैयार करते समय मिट्टी, गोबर की खाद और रेत का संतुलित मिश्रण करें. इससे पानी निकास भी सही रहेगा और पौधों को भरपूर पोषण मिलेगा.
कम जगह में ज्यादा प्याज उगाने की चाह में लोग अक्सर पौधे बहुत पास-पास लगा देते हैं, जो नुकसानदायक साबित होता है. पहाड़ी किसानों का अनुभव बताता है कि प्याज के पौधों के बीच 8 से 10 सेंटीमीटर की दूरी जरूरी है. इससे हर पौधे को मिट्टी से पोषण लेने और बल्ब फैलाने के लिए पर्याप्त जगह मिलती है. सही दूरी पर लगाए गए पौधे आपस में प्रतिस्पर्धा नहीं करते और प्याज का आकार बड़ा व रसदार बनता है. सीमित जगह में भी अगर दूरी का ध्यान रखा जाए, तो पैदावार की गुणवत्ता बेहतर मिलती है.
ये भी पढ़े : मुखिया के मुखारी -पक्ष -विपक्ष मस्त,छत्तीसगढ़िया पस्त है
प्याज की खेती में पानी का संतुलन बहुत जरूरी होता है, खासकर पहाड़ी क्षेत्रों में. यहां किसान सुबह के समय हल्की सिंचाई करना बेहतर मानते हैं. ज्यादा पानी देने से मिट्टी में नमी अधिक हो जाती है, जिससे प्याज के बल्ब सड़ने का खतरा बढ़ता है. वहीं कम पानी से पौधे कमजोर रह जाते हैं. किचन गार्डन में उगाई गई प्याज के लिए यह जरूरी है कि मिट्टी हमेशा हल्की नम रहे, लेकिन उसमें पानी जमा न हो. गमलों में ड्रेनेज होल होना भी बेहद जरूरी माना जाता है.
पहाड़ी इलाकों में आज भी रासायनिक खाद की जगह देसी खाद का उपयोग ज्यादा किया जाता है. गोबर की खाद, कंपोस्ट और पत्तियों से बनी जैविक खाद प्याज के लिए बेहद फायदेमंद होती है. इससे न सिर्फ मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है, बल्कि प्याज का स्वाद भी बेहतर होता है. समय-समय पर हल्की मात्रा में जैविक खाद डालने से पौधों को लगातार पोषण मिलता रहता है. किचन गार्डन में उगाई गई प्याज में देसी खाद का उपयोग करने से सेहत के लिहाज से भी यह ज्यादा सुरक्षित मानी जाती है.
प्याज की फसल को कीटों और रोगों से बचाने के लिए पहाड़ी किसान पुराने देसी तरीकों का सहारा लेते हैं. नीम की पत्तियों को पानी में उबालकर तैयार किया गया घोल पौधों पर छिड़कने से कीट दूर रहते हैं. इसके अलावा गौमूत्र का हल्का घोल भी प्राकृतिक कीटनाशक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. ये उपाय फसल को नुकसान पहुंचाए बिना सुरक्षित रखते हैं. किचन गार्डन में रासायनिक दवाओं से बचना चाहिए, क्योंकि देसी तरीकों से उगाई गई प्याज ज्यादा स्वास्थ्यवर्धक होती है.
पहाड़ी क्षेत्रों में प्याज की खेती करते समय किसान मिट्टी को समय-समय पर हल्का खोदते रहते हैं. इससे मिट्टी में हवा का संचार बना रहता है और जड़ें मजबूत होती हैं. जब मिट्टी सख्त हो जाती है, तो प्याज का विकास रुक सकता है. किचन गार्डन में भी हर 10–15 दिन में पौधों के आसपास की मिट्टी को हल्के हाथ से कुरेदना चाहिए. इससे खरपतवार भी निकल जाते हैं और पोषक तत्व सीधे पौधों तक पहुंचते हैं. यह तरीका सीमित जगह में अच्छी फसल के लिए बेहद उपयोगी है.
प्याज के अच्छे विकास के लिए धूप बेहद जरूरी होती है. पहाड़ी इलाकों में किसान ऐसी जगह प्याज लगाते हैं, जहां दिन में कम से कम 5–6 घंटे की धूप मिले. किचन गार्डन में भी गमलों या बेड को धूप वाली जगह रखना चाहिए. ठंडी और हल्की नमी वाली जलवायु प्याज के लिए अनुकूल मानी जाती है. ज्यादा ठंड या अत्यधिक गर्मी दोनों ही फसल को नुकसान पहुंचा सकती हैं. सही मौसम और पर्याप्त धूप से प्याज का आकार और स्वाद दोनों बेहतर बनते हैं.
प्याज की फसल तैयार होने के बाद सही समय पर उसकी खुदाई भी बेहद जरूरी होती है. पहाड़ी किसान तब प्याज निकालते हैं, जब उसकी पत्तियां पीली होकर झुकने लगती हैं. इसके बाद प्याज को कुछ दिनों तक छांव में सुखाया जाता है, ताकि नमी पूरी तरह खत्म हो जाए. सही तरीके से सुखाई गई प्याज लंबे समय तक खराब नहीं होती है. किचन गार्डन में उगाई गई प्याज को भी इसी तरीके से सुखाकर रखें. इससे घर में उगाई गई प्याज लंबे समय तक उपयोग में लाई जा सकती है.
.jpeg)
.jpeg)
.jpeg)

Comments