गेहूं की भरपूर पैदावार लेने के लिए दूसरा पानी और दूसरा खाद सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। यदि दूसरा पानी देने में देरी होती है, तो इसका सीधा असर फसल की ग्रोथ और दानों की गुणवत्ता पर पड़ता है। सही समय पर पानी न मिलने से गेहूं की बालियां एक साथ नहीं आतीं और दानों के पकने की प्रक्रिया प्रभावित होती है। इसके परिणामस्वरूप, कटाई के समय कुछ दाने पिचके हुए, कुछ हरे और कुछ खोखले रह जाते हैं, जिससे पैदावार में 30 से 35 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है।
सिंचाई का सही समय मिट्टी के प्रकार पर निर्भर करता है। आमतौर पर पहला पानी 22 से 30 दिनों के बीच दिया जाता है। इसके बाद, दूसरा पानी हर हाल में बुवाई के 40 से 45 दिनों के भीतर दे देना चाहिए। यदि किसान 45 दिन से ज्यादा की देरी करते हैं, तो खाद और पानी का पूरा चक्र बिगड़ जाता है। समय पर सिंचाई करने से मुख्य तना और बाद में निकलने वाले कल्ले (फुटवार) एक साथ बढ़ते हैं, जिससे पूरी फसल एक समान पकती है।
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कल्लों के सही विकास के लिए दूसरे पानी का बड़ा योगदान है। यदि मुख्य तने और कल्लों की बढ़वार में अंतर रह जाता है, तो मुख्य तने की बाली पहले पक जाती है और बाद में निकलने वाले कल्लों की बालियां छोटी रह जाती हैं। देरी से आने वाली बालियों को पकने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पाता और मार्च-अप्रैल की गर्म हवाओं के कारण उनके दाने दूधिया अवस्था में ही सूखकर पिचक जाते हैं। यही कारण है कि बाजार में ऐसी फसल का दाम भी कम मिलता है।
दूसरे पानी के साथ ही खाद का प्रबंधन भी 45 दिनों के भीतर पूरा कर लेना चाहिए। यूरिया और आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्वों को समय पर देने से तना मजबूत होता है। यदि यूरिया देने में देरी की जाती है, तो फसल का हरापन अंत तक बना रहता है और दाना भरते समय फसल के गिरने का खतरा बढ़ जाता है। समय पर खाद देने से पौधों को बालियां बनाने के लिए जरूरी ऊर्जा सही समय पर मिल जाती है।
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