रायपुर का पहला कमिश्नर कौन? 22 थानों की कमान या 4 जिलों का रुतबा; प्रतिष्ठा की लड़ाई में फंसी नई व्यवस्था...

रायपुर का पहला कमिश्नर कौन? 22 थानों की कमान या 4 जिलों का रुतबा; प्रतिष्ठा की लड़ाई में फंसी नई व्यवस्था...

रायपुर: छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में 23 जनवरी 2026 से ऐतिहासिक पुलिस कमिश्नरी प्रणाली लागू होने जा रही है। लेकिन इस नई व्यवस्था के लागू होने से पहले ही आईपीएस गलियारों में 'प्रतिष्ठा की लड़ाई' छिड़ गई है। वरिष्ठ अधिकारियों के सामने सबसे बड़ा 'धर्मसंकट' यह है कि वे रायपुर शहर के 22 थानों की कमान संभालकर 'पहले कमिश्नर' का गौरव प्राप्त करें या फिर आईजी के रूप में रायपुर देहात समेत 4 अन्य जिलों (धमतरी, महासमुंद, गरियाबंद और बलौदाबाजार) पर अपना दबदबा बरकरार रखें। यह असमंजस सत्ता के विकेंद्रीकरण और कार्यक्षेत्र के विस्तार के बीच फंसा हुआ है।

नई पुलिसिंग व्यवस्था के तहत रायपुर शहर को एक महानगरीय जिला के रूप में देखा जा रहा है, जहाँ कमिश्नर के पास कलेक्टर के 16 महत्वपूर्ण अधिकार होंगे। हालांकि, इसमें एक पेच यह है कि कमिश्नर का अधिकार क्षेत्र केवल शहरी सीमा के 22 थानों तक सीमित रहेगा, जबकि वर्तमान आईजी का रुतबा पूरे संभाग के जिलों तक फैला होता है। यही कारण है कि कई वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी पूरे शहर का कमिश्नर बनने के बजाय पूरे संभाग का आईजी बने रहना ज्यादा पसंद कर रहे हैं। इस खींचतान ने सरकार के लिए 'पहले कमिश्नर' के नाम पर मुहर लगाना चुनौतीपूर्ण बना दिया है।

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पहले कमिश्नर की दौड़ में वर्तमान में रामगोपाल गर्ग (दुर्ग आईजी) और संजीव शुक्ला (बिलासपुर आईजी) के नाम सबसे आगे चल रहे हैं। रामगोपाल गर्ग अपनी सख्त छवि और सीबीआई के अनुभव के लिए जाने जाते हैं, वहीं संजीव शुक्ला रायपुर की जमीनी हकीकत से बखूबी वाकिफ हैं। इनके अलावा अजय यादव और बद्री नारायण मीणा के नामों पर भी चर्चा गर्म है। सरकार एक ऐसे चेहरे की तलाश में है जो आईएएस लॉबी के साथ तालमेल बिठाते हुए इस नई और शक्तिशाली व्यवस्था को सफलतापूर्वक धरातल पर उतार सके।

23 जनवरी से लागू होने वाली इस प्रणाली में पुलिस कमिश्नर को धारा 144 लागू करने, जिला बदर करने और शस्त्र लाइसेंस (सीमित) जैसे कार्यकारी मजिस्ट्रेट के अधिकार मिलेंगे। हालांकि, आबकारी और पूर्ण शस्त्र लाइसेंस के अधिकार अभी भी कलेक्टर के पास ही रहेंगे। अब सबकी निगाहें मुख्यमंत्री और गृह विभाग पर टिकी हैं कि वे इस 'प्रतिष्ठा की जंग' को शांत करते हुए रायपुर की सुरक्षा की कमान किस 'कड़क' अफसर के हाथों में सौंपते हैं।










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