मंदिर की सीढ़ियां चढ़ते ही सबसे पहले हमारा हाथ ऊपर लटकी पीतल की घंटी या बड़े से घंटे की ओर जाता है। यह एक ऐसी आदत है जिसे हम बचपन से देखते और अपनाते आ रहे हैं। अक्सर लोग मानते हैं कि घंटी बजाकर हम भगवान को अपनी उपस्थिति की सूचना देते हैं या उन्हें 'जगाते' हैं। लेकिन, प्राचीन भारतीय ग्रंथों और आधुनिक ध्वनिकी विज्ञान की मानें, तो इसके पीछे एक गहरा वैज्ञानिक और मानसिक कारण छिपा है।
धातु विज्ञान और मस्तिष्क का गहरा संबंध
धातु विज्ञान (Metallurgy) के जानकारों और प्राचीन शिल्पशास्त्र के अनुसार, मंदिर की घंटियां कोई साधारण धातु का टुकड़ा नहीं होतीं। इन्हें बनाने में कैडमियम, सीसा, तांबा, जस्ता, निकेल और क्रोमियम जैसी कई धातुओं का एक विशेष वैज्ञानिक अनुपात में मिश्रण किया जाता है।
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जब हम घंटी बजाते हैं, तो इससे निकलने वाली ध्वनि एक विशेष प्रकार की गूंज (Echo) पैदा करती है। यह गूंज हमारे मस्तिष्क के दाएं और बाएं (Left and Right Brain) दोनों हिस्सों के बीच एक तालमेल बिठाती है। जैसे ही घंटी की तीखी आवाज हमारे कानों में पड़ती है, वह मस्तिष्क के 'रिसेप्टर्स' को एक्टिव कर देती है। इससे हम एक सेकंड के अंदर पूरी तरह सतर्क और एकाग्र हो जाते हैं।
आध्यात्मिक अर्थ: 'ॐ' की गूंज
जब आप घंटी बजाते हैं, तो उसकी ध्वनि कम से कम 7 सेकंड तक गूंजती है। योग और ध्यान के जानकारों का मानना है कि यह 7 सेकंड की गूंज हमारे शरीर के सात हीलिंग केंद्रों यानी 'चक्रों' को स्पर्श करती है। इस प्रक्रिया में हमारे दिमाग के सारे नकारात्मक विचार एक पल के लिए रुक जाते हैं और हम उस 'शून्य' की स्थिति में पहुंच जाते हैं, जहां ईश्वर के साथ जुड़ना आसान हो जाता है।
बैक्टीरिया और नकारात्मकता का नाश
प्राचीन लोक मान्यताओं और वास्तु शास्त्र के सिद्धांतों के अनुसार, घंटी की तेज आवाज वातावरण में मौजूद सूक्ष्म कीटाणुओं और नकारात्मक ऊर्जा को नष्ट करने की क्षमता रखती है। इसीलिए, मंदिर जैसे सार्वजनिक स्थानों पर घंटी बजाने से न केवल मन शांत होता है, बल्कि वहां का वातावरण भी शुद्ध बना रहता है।
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