सोनहत:एक तरफ हम डिजिटल इंडिया और विकास की लंबी-चौड़ी बातें करते हैं, वहीं दूसरी ओर समाज के अंतिम छोर पर खड़ा एक परिवार आज 'जीते जी मरने' को मजबूर है। राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र कहे जाने वाले पंडो समाज (विशेष संरक्षित जनजाति) का आजादी के पूर्व जन्मा सोमार साय जिसने कभी आजादी का सूरज देखा था आज अमृतकाल के दौर में यह बुजुर्ग सोमार साय पंडो और उसकी पत्नी मानकुंवर आज शासन-प्रशासन की संवेदनहीनता की ऐसी मिसाल बन गए है, जिसे सुनकर किसी भी पत्थर दिल इंसान की रूह कांप जाए।
अंधेरे में डूबी दो जिंदगियां, सहारे के नाम पर सिर्फ लाठी
यह कहानी है सोनहत के ग्राम पंचायत पोड़ी के एक ऐसे बुजुर्ग की,है जो न केवल दोनों आंखों से देख सकते हैं, बल्कि एक पैर से विकलांग होने के कारण चलने-फिरने में भी असमर्थ हैं। नियति की मार यहीं खत्म नहीं होती—उनकी पत्नी भी दोनों आंखों से पूरी तरह अंधी हैं। जिस घर में रोशनी की एक किरण तक नसीब नहीं, वहां यह दंपत्ति एक-दूसरे का हाथ थामे अब सिर्फ मौत का इंतजार कर रहे हैं।

सिस्टम की मार: 'अंत्योदय' छीना, 'प्राथमिकता' थमाया
जो परिवार दाने-दाने के लिए सरकार के पी डी एस सिस्टम पर निर्भर था , उनके साथ सरकारी सिस्टम ने क्रूर मजाक भी कर डाला इनका 'अंत्योदय राशन कार्ड' (जो सबसे गरीबों के लिए होता है) बदलकर 'प्राथमिकता कार्ड' कर दिया गया है। नतीजा यह हुआ कि अब उन्हें मिलने वाला राशन भी कम हो गया है। सवाल यह उठता है कि क्या प्रशासन की नजर में इस दिव्यांग और वृद्ध दंपत्ति की स्थिति अब 'बेहतर' हो गई है?
योजनाएं कागजों पर, हकीकत में सिफर सरकारी दावों की पोल इस परिवार की चौखट पर आकर खुल जाती है।
विकलांग पेंशन: नियम और दस्तावेजों के मकड़जाल में उलझी पेंशन आज तक इनके हाथ नहीं पहुंची।
महतारी वंदन योजना: महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने वाली इस योजना का लाभ भी अधूरा है; पत्नी के खाते में महज आधी राशि अर्थात 500 ही पहुंच पा रही है क्योंकि महिला को वृद्धा पेंशन मिलता है।

प्रशासनिक अनदेखी: पंडो समाज, जिसे राष्ट्रपति का दत्तक पुत्र माना जाता है, आज अपने ही हक के लिए दर-दर भटकने को मजबूर है।
आवास: सन 2016 आस पास बिना कालम वाला आवास मिला था लेकिन वह वर्तमान में जर्जर हो चुका है, जगह जगह से क्रैक हो गया है, बुजुर्ग दम्पत्ति खपरैल और कच्चे झोपड़ीनुमा मकान में निवासरत हैं
बड़ा सवाल: कब जागेगा प्रशासन?
क्या प्रशासन किसी अनहोनी का इंतजार कर रहा है? क्या एक दिव्यांग और नेत्रहीन दंपत्ति से भी ज्यादा पात्र कोई और हो सकता है? यह समाचार केवल एक खबर या सूचना नहीं, बल्कि उन जिम्मेदार अधिकारियों के जमीर पर चोट है जो फाइलों में 'सब ठीक है' का दावा करते हैं। इस परिवार को तत्काल पूर्ण राशन, रुकी हुई विकलांग पेंशन और नए आवास सहायता की आवश्यकता है। यदि समय रहते इनकी सुध नहीं ली गई, तो यह आधुनिक समाज और कल्याणकारी सरकार के चेहरे पर एक कभी न मिटने वाला कलंक होगा।
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क्या इन 'पथराई आंखों' की उम्मीद बनेगा जिला प्रशासन?
विकास की चकाचौंध के बीच, पंडो समाज के इस बेबस दंपत्ति की 'खामोश चीख' शायद अभी तक जिला प्रशासन तक नहीं पहुंच पाई है। जब एक दिव्यांग नेत्रहीन और एक पैर से निःशक्त बुजुर्ग और नेत्रहीन बुजुर्ग पत्नी को अपना पेट पालने के लिए सिस्टम के आगे लगातार रोना पड़े, तो यह समाज के लिए शर्म का विषय है।
प्रशासन से कुछ चुभते सवाल:
* जिस परिवार में दोनों सदस्य दृष्टिहीन हों और मुखिया का एक पैर न हो, उनका 'अंत्योदय' कार्ड काटकर 'प्राथमिकता' में किसने और क्यों डाला? क्या यह उनकी गरीबी का मजाक नहीं है?
* 'विकलांग पेंशन जिसे तत्काल मिलनी चाहिए थी, वह सालों से किन फाइलों में धूल फांक रही है?
* क्या प्रशासन केवल शिविरों और कागजी आंकड़ों तक सीमित है? क्या धरातल पर ऐसे बेसहारा परिवारों का सर्वे करना विभाग की जिम्मेदारी नहीं?
एक विनम्र अपील
कलेक्टर महोदया इस परिवार को किसी लंबी जांच की नहीं, बल्कि 'त्वरित मानवीय हस्तक्षेप' की जरूरत है। क्योंकि वे देख नहीं सकते और न ही चलने में सक्षम हैं।
जनता और हम उम्मीद करते हैं कि आप स्वयं इस मामले का संज्ञान लेंगे और शासन के उन वादों को पूरा करेंगे, जो 'अंतिम व्यक्ति' के उत्थान के लिए किए गए थे। इस परिवार की बुझती हुई आंखों में शासन के प्रति विश्वास की एक ज्योति जलाना अब आपके हाथ में है प्रशासन खुद इन तक पहुचे और इन्हें योजनाओं से जोड़े, और यदि किसी तकनीकी कारणों से ये योजनाओं के पात्र भी नही होते तो मानवीयता आधार पर इन्हें प्रशासनिक मदद उपलब्ध कराई जाए
मदद के लिए हाथ बढ़ाएं
प्रशासन से मांग: तत्काल राशन कार्ड बहाल हो, पेंशन शुरू की जाए और उचित आवास दिया जाए। कम से कम एक ट्राई सायकल व्हील चेयर उपलब्ध कराया जाए
सामाजिक संगठनों से अपील: जो भी संस्था या व्यक्ति इस परिवार की मदद करना चाहते हैं, कृपया आगे आएं।
हम नही देख सकते तो क्या हुआ सरकार तो देख सकती है- सोमार साय
साहब, हम देख नहीं सकते तो क्या हुआ, सरकार तो देख सकती है? क्या हमारी बेबसी का कोई अंत नहीं?" — ये अनकहे शब्द उस बुजुर्ग की आंखों की नमी में साफ पढ़े जा सकते हैं।
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