भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म में श्राद्ध कर्म को पितृ ऋण से मुक्ति का सबसे सरल मार्ग माना गया है। इनमें 'एकोदिष्ट श्राद्ध' का विशेष स्थान है, जो किसी एक मृत व्यक्ति की आत्मा की शांति के लिए होता है। वर्ष 2026 में भीष्म अष्टमी 26 जनवरी को मनाई जाएगी, जिसका श्राद्ध से गहरा संबंध है। शास्त्रों के अनुसार, इस दिन पितरों के लिए तर्पण करना अनंत फलदायी है।
'एकोदिष्ट' का अर्थ है एक ही आत्मा को उद्देश्य बनाकर दी गई अंजलि। भीष्म पितामह ने इसी दिन देह त्यागी थी, इसलिए यह समय मोक्ष प्राप्ति के लिए श्रेष्ठ है। इस दिन श्रद्धा से किया गया श्राद्ध न केवल पितरों को तृप्त करता है, बल्कि परिवार में सुख, शांति और वंश वृद्धि का आशीर्वाद भी लाता है।
एकोदिष्ट श्राद्ध का स्वरूप और महत्व
एकोदिष्ट श्राद्ध को 'नैमित्तिक श्राद्ध' भी कहते हैं एकोदिष्ट श्राद्ध' वह विशेष पूजा है जो परिवार के किसी एक मृत सदस्य की आत्मा की शांति के लिए की जाती है। आम श्राद्धों में हम कई पूर्वजों को याद करते हैं, लेकिन इसमें केवल उसी व्यक्ति को जल और भोजन अर्पित किया जाता है जिसकी पुण्यतिथि (मृत्यु की तारीख) होती है।
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शास्त्रों के अनुसार, इंसान की मृत्यु के ग्यारहवें दिन और फिर हर साल उसकी बरसी पर यह श्राद्ध करना बहुत जरूरी है। इस पूजा की खास बात यह है कि इसमें केवल एक ही 'पिंड' दान किया जाता है और एक ही पवित्र 'कुश' का उपयोग होता है। यह माना जाता है कि इस विधि से भटकती हुई आत्मा को शांति मिलती है और उसे पितृलोक में सुखद स्थान प्राप्त होता है।
श्राद्ध की तैयारी और पूजन सामग्री
इस अनुष्ठान को सफल बनाने के लिए शुद्धता और सही सामग्री का होना बहुत आवश्यक है। विधि शुरू करने से पहले घर के आंगन या पवित्र स्थान को गोबर से लीप कर शुद्ध किया जाता है। पूजन के लिए काले तिल, कुश (पवित्र घास), गंगाजल, गाय का कच्चा दूध, अक्षत (चावल) और जों की आवश्यकता होती है। श्राद्धकर्ता को इस दिन संयम और श्रद्धा के साथ सफेद वस्त्र धारण करने चाहिए।
हाथ में 'पवित्री' (कुश की अंगूठी) पहनकर पितरों का आह्वान किया जाता है। इस विधि में चांदी के पात्रों का उपयोग श्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि चांदी को पितरों की प्रिय धातु माना जाता है। सही सामग्री और एकाग्र मन से किया गया यह दान सीधे मृत आत्मा तक पहुंचता है।
पिंड दान और तर्पण की मुख्य विधि
एकोदिष्ट श्राद्ध के काम में 'पिंड दान' और 'तर्पण' करना सबसे जरूरी हिस्सा माना जाता है। पिंड बनाने के लिए पके हुए चावल, दूध, घी और शहद को मिलाकर छोटे गोले तैयार किए जाते हैं। इस दौरान अपना चेहरा दक्षिण दिशा की तरफ रखकर, पूरी श्रद्धा के साथ उस व्यक्ति का नाम और उनके परिवार (गोत्र) का नाम लेकर पिंड अर्पित किया जाता है। इसके बाद पानी में काले तिल और कुश डालकर तर्पण किया जाता है, यानी पितरों को जल दिया जाता है।
शास्त्रों में बताया गया है कि इस दौरान मंत्रों को बिल्कुल साफ-साफ बोलना चाहिए ताकि उनकी आवाज का सकारात्मक असर आत्मा तक पहुंच सके। पिंड दान करने के बाद, उस पिंड को या तो किसी पवित्र नदी के बहते पानी में डाल दिया जाता है या फिर गाय को खिला दिया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस विधि से मृत व्यक्ति की आत्मा की भूख और प्यास शांत होती है और उन्हें तृप्ति मिलती है।
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