मेनोपॉज, कमजोर इम्युनिटी और कैंसर: डॉक्टर ने बताया इनके बीच का गहरा संबंध

मेनोपॉज, कमजोर इम्युनिटी और कैंसर: डॉक्टर ने बताया इनके बीच का गहरा संबंध

 अक्सर हम मेनोपॉज को केवल "पीरियड्स के बंद होने" के रूप में देखते हैं, लेकिन असलियत में यह हमारे शरीर के लिए इससे कहीं बढ़कर है। यह शरीर की रक्षा प्रणाली यानी इम्युनिटी में एक बड़े बदलाव का संकेत है। डॉ. कनिका बत्रा मोदी (एसोसिएट डायरेक्टर और क्लीनिकल लीड - गायनी ऑन्को, मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, साकेत) का कहना है कि उम्र बढ़ने के साथ हमारी बीमारियों से लड़ने की क्षमता थोड़ी धीमी हो जाती है। इसे विज्ञान की भाषा में ‘इम्यूनोसेनेसेंस’ कहा जाता है।

हार्मोन और शरीर का बदलता माहौल

मेनोपॉज के बाद शरीर में एस्ट्रोजन हार्मोन का स्तर गिरने लगता है। यह गिरावट सिर्फ मूड या हड्डियों पर असर नहीं डालती, बल्कि महिलाओं के निजी अंगों को भी प्रभावित करती है। एस्ट्रोजन योनि के पीएच को एसिडिक और स्वस्थ बनाए रखने में मदद करता है।

जब एस्ट्रोजन कम होता है, तो पीएच का संतुलन बिगड़ जाता है और सुरक्षा करने वाले अच्छे बैक्टीरिया कम होने लगते हैं। यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह लोकल सिस्टम शरीर की 'फ्रंटलाइन इम्युनिटी' का हिस्सा है। जब यह सुरक्षा कवच कमजोर पड़ता है, तो शरीर के लिए एचपीवी जैसे संक्रमणों को रोकना मुश्किल हो जाता है।

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सर्वाइकल कैंसर और इम्युनिटी का कनेक्शन

सर्वाइकल कैंसर कोई अचानक होने वाली बीमारी नहीं है। यह 'हाई-रिस्क ह्यूमन पैपिलोमावायरस' (HPV) के लंबे समय तक शरीर में रहने के कारण होता है। आमतौर पर हमारी इम्युनिटी इस वायरस को खुद ही खत्म कर देती है। समस्या तब शुरू होती है जब वायरस खत्म नहीं होता और सालों तक शरीर में बना रहता है, जिससे बाद में कैंसर का खतरा बढ़ जाता है (Link Between Menopause and Immunity)।

यही वह जगह है जहां इम्युनिटी का रोल सबसे अहम् है। अगर इम्युनिटी कमजोर है- जैसे कि एचआईवी, अंग प्रत्यारोपण, या ऑटोइम्यून बीमारियों की दवाओं के कारण- तो एचपीवी वायरस के शरीर में टिके रहने की संभावना बढ़ जाती है। मेनोपॉज सीधे तौर पर कैंसर का कारण नहीं बनता, लेकिन बढ़ती उम्र और हार्मोनल बदलावों के कारण शरीर की निगरानी प्रणाली कमजोर हो सकती है, जिससे पुराने इन्फेक्शन को पनपने का मौका मिल जाता है।

पुराने इन्फेक्शन का दोबारा जागना

एक जरूरी बात जो हर महिला को जाननी चाहिए: ऐसा हो सकता है कि एचपीवी का संक्रमण जवानी में हुआ हो और वह सालों तक शांत अवस्था में रहा हो। उम्र बढ़ने के साथ जब इम्युनिटी का कंट्रोल कम होता है, तो यह वायरस दोबारा सक्रिय हो सकता है। इसलिए इसका मकसद आपको डराना नहीं, बल्कि सतर्क करना है।

मेनोपॉज के बाद महिलाएं क्या करें?

1. स्क्रीनिंग बंद न करें: सिर्फ इसलिए कि पीरियड्स बंद हो गए हैं, इसका मतलब यह नहीं कि आप जांच करानी छोड़ दें। पैप स्मीयर और एचपीवी टेस्ट कैंसर बनने से बहुत पहले ही खतरे को पकड़ सकते हैं। अपनी उम्र और पुरानी रिपोर्ट्स के आधार पर अपने डॉक्टर से सलाह लें कि आपको कब-कब जांच करानी चाहिए।

2. लक्षणों को नजरअंदाज न करें: मेनोपॉज के बाद ब्लीडिंग होना, लगातार डिस्चार्ज होना, पेल्विक दर्द या शारीरिक संबंध बनाते समय दर्द होना- इन संकेतों को कभी भी अनदेखा न करें। जरूरी नहीं कि यह कैंसर ही हो, लेकिन इसकी जांच कराना अनिवार्य है।

3. इम्युनिटी और सेहत का ख्याल रखें: डायबिटीज को कंट्रोल में रखें, शरीर में खून और विटामिन्स की कमी न होने दें, अच्छी नींद लें और एक्टिव रहें। धूम्रपान से पूरी तरह बचें, क्योंकि यह एचपीवी वायरस को शरीर में बनाए रखने में मदद करता है।

सर्वाइकल कैंसर उन गिने-चुने कैंसरों में से है जिसे पूरी तरह रोका जा सकता है। मेनोपॉज एक रिमाइंडर होना चाहिए कि हम अपनी सेहत के प्रति लापरवाही न बरतें। समय पर जांच, लक्षणों पर नजर और सही लाइफस्टाइल ही सबसे बड़ा बचाव है। साथ ही, परिवार में बच्चों को एचपीवी वैक्सीन लगवाने के लिए प्रोत्साहित करें, क्योंकि रोकथाम की शुरुआत बचपन से ही होनी चाहिए।

 










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