बिलासपुर : कलेक्ट्रेट के जनदर्शन कक्ष में सोमवार को फाइलों से ज़्यादा चेहरे थे। कोई जल्दी में नहीं था, लेकिन हर कोई इंतज़ार में था—अपनी बारी का, अपनी बात कह पाने का। सामने मेज़ पर बैठे कलेक्टर संजय अग्रवाल के पास एक के बाद एक लोग पहुंचे। आवेदन हाथ में थे, मगर बात काग़ज़ से आगे की थी।
मस्तूरी ब्लॉक के गांव गुड़ी से आई कोशम बाई सूर्यवंशी की आवाज़ में हिचक नहीं थी, बस मजबूरी थी। मजदूरी से घर चलता है, लेकिन शौचालय नहीं है। रोज़ की ज़िंदगी में यह कमी परेशानी बन चुकी है। उनकी बात सुनी गई, आवेदन लिया गया और जांच के निर्देश दिए गए—आगे क्या होगा, यह सवाल अभी खुला है।
मोपका वार्ड क्रमांक 48 से आए लोगों की कहानी किसी एक घर की नहीं थी। उनका कहना था कि जोगनीन-जोगिया तालाब तक जाने वाला पुराना रास्ता अब दिखाई नहीं देता—वह दीवारों के भीतर बंद कर दिया गया है। बिल्डरों द्वारा किए गए कब्ज़े ने तालाब तक पहुंच मुश्किल कर दी है। निस्तारी का सवाल है, पर जवाब अभी जांच पर टिका है।
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जरहाभाठा की संतोषी बाई चुपचाप अपनी बारी का इंतज़ार करती रहीं। दिव्यांग हैं, किराये के घर में रहती हैं और चाहती हैं कि सब्जी बेचकर खुद का खर्च निकाल सकें। उन्होंने मदद नहीं मांगी, सिर्फ शुरुआत के लिए सहारा चाहा। बैंक से जुड़ी प्रक्रिया का भरोसा दिया गया।
सीपत तहसील के दर्राभांठा गांव से आए ग्रामीणों ने सामूहिक शिकायत रखी। उनका आरोप था कि गांव की शासकीय जमीन पर कब्ज़ा कर खेती और मकान खड़ा कर दिया गया है। यह सिर्फ जमीन का मामला नहीं, गांव की व्यवस्था और भविष्य से जुड़ा सवाल है। तहसील स्तर पर जांच की बात कही गई।
जनदर्शन उस दिन किसी समाधान की घोषणा का मंच नहीं बना। यह एक पड़ाव था, जहां बातें कही गईं, आवेदन जमा हुए और निर्देश लिखे गए। शौचालय, रास्ता, रोज़गार और जमीन—ये समस्याएं नई नहीं हैं। फर्क बस इतना है कि हर हफ्ते ये अलग-अलग चेहरों के साथ सामने आती हैं।अब सवाल यही है कि जनदर्शन की यह कतार काग़ज़ों में सिमटती है या ज़मीन पर उतरती है ।
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