दंतेवाड़ा में जनजातीय गौरव और परंपरा का पर्व बस्तर पंडुम का हुआ शुभारंभ

दंतेवाड़ा में जनजातीय गौरव और परंपरा का पर्व बस्तर पंडुम का हुआ शुभारंभ

दंतेवाड़ा : बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, लोक परंपराओं और जनजातीय अस्मिता को सहजने एवं संवारने के उद्देश्य से बस्तर पंडुम का आयोजन किया जा रहा है।इसी क्रम में बुधवार दंतेवाड़ा स्थित माँ दंतेश्वरी मंदिर के पावन प्रांगण में जिला स्तरीय बस्तर पंडुम का भव्य आयोजन किया गया। कार्यक्रम में बस्तर की लोकसंस्कृति, पारंपरिक कला, नृत्य, संगीत एवं रीति-रिवाजों की जीवंत झलक देखने को मिली, जिसने उपस्थित जनसमूह को बस्तर की आत्मा से जोड़ दिया।जिला स्तरीय बस्तर पंडुम के अवसर पर मुख्य अतिथि प्रदेश के वन एवं जलवायु परिवर्तन, परिवहन, सहकारिता एवं संसदीय कार्य विभाग के मंत्री तथा जिले के प्रभारी मंत्री केदार कश्यप ने अपने उद्बोधन में उपस्थित सभी भाई-बहनों, माताओं-पिताओं, वरिष्ठ नागरिकों एवं युवा साथियों का आत्मीय स्वागत किया। उन्होंने कहा कि बस्तर की समृद्ध संस्कृति, परंपराओं और विरासत को सहेजना हम सभी का सामूहिक दायित्व है।

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मंत्री कश्यप ने कहा कि उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत दंतेवाड़ा जिले से हुई है और उनके जीवन का आधा से अधिक समय यहीं बीता है। उन्होंने गर्व के साथ कहा कि आज बस्तर बदल रहा है, बस्तर की तस्वीर बदल रही है और देश-विदेश में बस्तर की एक नई पहचान बन रही है। प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्री के मंशानुसार बस्तर की संस्कृति और परंपराओं को संरक्षित एवं प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से बस्तर पंडुम का आयोजन किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि बस्तर पर्यटन की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध क्षेत्र है। माँ दंतेश्वरी मंदिर, ढोलकाल, बारसूर, चित्रकूट और तीरथगढ़ जैसे अनेक प्रमुख पर्यटन स्थल बस्तर की पहचान हैं। बस्तर पंडुम के माध्यम से हम अपनी सांस्कृतिक धरोहर को विश्व पटल तक पहुँचाने का कार्य कर रहे हैं। इस आयोजन में 12 विधाओं में सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए जा रहे हैं।

मंत्री कश्यप ने कहा कि हमारे पूर्वजों ने बस्तर की संस्कृति को सहज और जीवंत रखा है, और यह हम सभी का कर्तव्य है कि इस सांस्कृतिक विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रखें। उन्होंने कहा कि पहले बीजापुर, सुकमा और दंतेवाड़ा में जहाँ कभी गोलियों की गूंज सुनाई देती थी, आज वहाँ ढोल-मांदर की थाप सुनाई दे रही है, जो बस्तर के बदलते स्वरूप को दर्शाती है। उन्होंने आगे कहा कि हमें केवल किताबों तक सीमित नहीं रहना है, बल्कि पूर्वजों से मिली संस्कृति को जीकर उसकी पहचान बनानी है। अब बस्तर से नक्सलवाद समाप्ति की ओर है और यह क्षेत्र एक समृद्ध एवं विकसित बस्तर के रूप में आगे बढ़ रहा है। जो जिले पहले अति संवेदनशील कहलाते थे, वे आज प्रधानमंत्री द्वारा घोषित आकांक्षी जिलों में शामिल हैं। उन्होंने युवा वर्ग से बस्तर के पारंपरिक गीत, संगीत जैसे ’’आया माचो दंतेश्वरी’’ और ’’साय रेला’’ जैसे पारंपरिक गीतों को सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म में फॉलों कर प्रचार-प्रसार करने को आग्रह किया। इसके साथ ही उन्होंने जिला स्तरीय बस्तर पंडुम के स्टॉलों का निरीक्षण करते हुए दीदियों के द्वारा बनाई गई व्यंजनों का स्वाद चखा।कार्यक्रम में विधायक चैतराम अटामी,जिला पंचायत अध्यक्ष नंदलाल मुड़ामी,कलेक्टर देवेश कुमार ध्रुव बड़ी संख्या में ग्रामीणजन,सर्व समाज प्रमुख उपस्थित थे।










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