वाड्रफनगर : रघुनाथनगर वन परिक्षेत्र अंतर्गत तुगुवां गांव में जंगल की सैकड़ों एकड़ शासकीय भूमि पर भू-माफियाओं द्वारा अवैध लगातार किया जा रहा है स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि लंबे समय से संगठित तरीके से जंगल की जमीन पर कब्जा किया जा रहा है, लेकिन जिम्मेदार विभाग आंख मूंदे बैठा है। ग्रामीणों के अनुसार, जंगल से ही अवैध रूप से पेड़ों की कटाई कर लकड़ी निकाली जा रही है और उसी लकड़ी का उपयोग कर 30 से अधिक मिट्टी के घर बनाए जा चुके हैं। यह निर्माण कार्य खुलेआम किया जा रहा है, जिससे साफ जाहिर होता है कि भू-माफियाओं को किसी न किसी स्तर पर संरक्षण प्राप्त है। ग्रामीणों का आरोप है कि इन अवैध गतिविधियों में अन्य राज्यों से आए भू-माफिया भी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं, जो स्थानीय लोगों को डरा-धमकाकर जमीन पर कब्जा कर रहे हैं।
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ग्रामीणों ने बताया कि उन्होंने इस पूरे मामले की लिखित और मौखिक शिकायत कई बार वन विभाग के अधिकारियों से की, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। न तो अवैध कब्जे हटाए गए और न ही लकड़ी कटान पर रोक लगी। इससे ग्रामीणों में भारी आक्रोश है। उनका कहना है कि यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो पूरे वन क्षेत्र का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। ग्रामीणों ने वन विभाग पर भू-माफियाओं से मिलीभगत का सीधा आरोप लगाया है। उनका कहना है कि विभागीय अधिकारियों की निष्क्रियता संदेह पैदा करती है और यह आशंका गहराती जा रही है कि बिना अंदरूनी सहयोग के इतने बड़े पैमाने पर जंगल की जमीन पर कब्जा संभव नहीं है। ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि कुछ कर्मचारियों को अवैध निर्माण की जानकारी होने के बावजूद वे मौके पर नहीं पहुंचते।
इस मामले ने पर्यावरण और वन संरक्षण को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि जंगलों की इसी तरह कटाई और कब्जा जारी रहा तो आने वाले समय में क्षेत्र में जल संकट, वन्यजीवों का विस्थापन और पर्यावरणीय असंतुलन जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। ग्रामीणों ने जिला प्रशासन और राज्य सरकार से मांग की है कि पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए, दोषी अधिकारियों और भू-माफियाओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो तथा अवैध कब्जों को तत्काल हटाया जाए। साथ ही वन क्षेत्र में नियमित गश्त और निगरानी व्यवस्था मजबूत करने की भी मांग की गई है। अब देखना यह है कि प्रशासन इस गंभीर मामले को कितनी गंभीरता से लेता है और जंगल की कीमती भूमि को भू-माफियाओं से मुक्त कराने के लिए कब तक ठोस कदम उठाए जाते हैं।
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