कल्पवास में शय्या दान का महत्व,जानें क्यों जरूरी है यह परंपरा

कल्पवास में शय्या दान का महत्व,जानें क्यों जरूरी है यह परंपरा

 संगम की रेती पर जब आस्था का सैलाब उमड़ता है, तो उसे 'माघ मेला' कहते हैं। यहां कल्पवास करने वाले श्रद्धालुओं के लिए नियम और परंपराएं बहुत कड़े होते हैं। लेकिन, इन्हीं में छिपा है मोक्ष का मार्ग । इन्हीं महत्वपूर्ण परंपराओं में से एक है- शय्या दान ।

क्या होता है कल्पवास और शय्या दान?

कल्पवास का अर्थ है एक निश्चित समय के लिए संगम तट पर निवास करते हुए संयम और सात्विक जीवन जीना। धार्मिक शास्त्रों और विद्वानों के अनुसार, कल्पवास की पूर्णता तभी मानी जाती है जब भक्त अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार दान-पुण्य करता है। इसमें 'शय्या दान' (बिस्तर और बिस्तर से जुड़ी वस्तुओं का दान) सबसे उत्तम माना गया है।

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मान्यता है कि कल्पवास के दौरान एक कल्पवासी जमीन पर सोता है और कठोर तप करता है। जब उसका कल्पवास समाप्त होता है, तो वह दूसरों के सुख और आराम के लिए बिस्तर, गद्दा, चादर, तकिया और यहां तक कि पलंग का दान करता है।

शय्या दान का धार्मिक महत्व

पुराणों में वर्णित कथाओं के संकेत मिलते हैं कि शय्या दान करने से न केवल इस जन्म के पापों का नाश होता है, बल्कि पितरों को भी शांति मिलती है। ऐसी मान्यता है कि जो व्यक्ति कल्पवास के बाद विधि-विधान से शय्या दान करता है, उसे मृत्यु के बाद यमलोक के कष्ट नहीं सहने पड़ते और स्वर्ग में जगह मिलती है।

यह दान केवल एक वस्तु का दान नहीं है, बल्कि यह अपने सुखों को त्याग कर दूसरों की सेवा करने की भावना का प्रतीक है। ज्योतिषीय और आध्यात्मिक मान्यताओं के अनुसार, शय्या दान से कुंडली के कई दोष शांत होते हैं और घर में सुख-समृद्धि आती है।

दान में किन बातों का रखें ध्यान?

शय्या दान में सिर्फ पलंग ही नहीं, बल्कि एक पूरा बिस्तर सेट दिया जाता है। इसमें आमतौर पर:

नया गद्दा और चादर होती है

तकिया और कंबल या रजाई

सामर्थ्य हो तो मच्छरदानी और छाता भी। यह दान किसी योग्य ब्राह्मण या जरूरतमंद को पूरी श्रद्धा के साथ, दक्षिणा रखकर दिया जाना चाहिए।










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