घोटाले से हिला प्रशासन : शिक्षा विभाग में 218 करोड़ रुपये के कथित घोटाले से मचा हड़कंप

घोटाले से हिला प्रशासन : शिक्षा विभाग में 218 करोड़ रुपये के कथित घोटाले से मचा हड़कंप

कवर्धा  : छत्तीसगढ़ के कवर्धा जिले के शिक्षा विभाग में करोड़ों रुपये के वित्तीय लेन-देन पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं. दरअसल, विभागीय ऑडिट के दौरान यह सामने आया कि अक्टूबर 2022 से अक्टूबर 2025 के बीच कोषालय से निकाली गई, लगभग 218 करोड़ रुपये की राशि का पूरा और प्रमाणित लेखा-जोखा विभागीय अभिलेखों में उपलब्ध नहीं है. जांच में यह भी पाया गया कि संबंधित अवधि की कैश बुक, बिल-वाउचर और व्यय से जुड़े दस्तावेज व्यवस्थित रूप से सुरक्षित नहीं किए गए.

ऑडिट टीम ने विकासखंड शिक्षा अधिकारी कार्यालय, कवर्धा के आय-व्यय का परीक्षण किया. रिपोर्ट में उल्लेख है कि इतनी बड़ी राशि के खर्च से जुड़े मूल दस्तावेज या तो अनुपलब्ध हैं या अधूरे हैं. इससे सरकारी धन के उपयोग की पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं. एरियर्स भुगतान से जुड़ी कई फाइलें भी संदिग्ध स्थिति में मिली.

पूर्व और वर्तमान अधिकारियों के दावे अलग-अलग

यह मामला उस समयावधि से जुड़ा बताया जा रहा है, जब संजय जायसवाल विकासखंड शिक्षा अधिकारी के पद पर थे. मामले के उजागर होने के बाद उनसे स्पष्टीकरण मांगा गया, तो उन्होंने एक वीडियो जारी कर कहा कि उन्होंने अपने कार्यकाल से जुड़े सभी रिकॉर्ड दिसंबर 2025 में डिजिटल फॉर्म में कार्यालय को सौंप दिए थे. हालांकि, वर्तमान बीईओ संजय दुबे का कहना है कि अब तक पूरा रिकॉर्ड व्यवस्थित रूप में प्राप्त नहीं हुआ है और यदि रिकॉर्ड जमा किया गया है, तो उसकी आधिकारिक रसीद प्रस्तुत की जानी चाहिए. दोनों पक्षों के दावों में अंतर ने स्थिति को और उलझा दिया है.

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प्रारंभिक कार्रवाई में दो कर्मचारी निलंबित

जिला शिक्षा अधिकारी एफआर वर्मा ने प्रारंभिक स्तर पर कार्रवाई करते हुए तत्कालीन सहायक ग्रेड-02 माया कसार और योगेंद्र सिंह कश्यप को निलंबित कर दिया है. आरोप है कि 2023 से 2025 के बीच कैश बुक का विधिवत सुरक्षित नहीं रखा गया.

जांच का दायरा बढ़ने की संभावना

अधिकारियों का कहना है कि यह सिर्फ शुरुआती कार्रवाई है और जांच का दायरा आगे बढ़ सकता है. सूत्रों के अनुसार मामले की विस्तृत जांच जारी है. यदि दस्तावेजी रूप से वित्तीय गड़बड़ी की पुष्टि होती है, तो अन्य जिम्मेदार अधिकारियों पर भी कार्रवाई की जा सकती है. फिलहाल, विभाग के भीतर रिकॉर्ड के संरक्षण और जिम्मेदारी तय करने को लेकर मतभेद खुलकर सामने आ चुके हैं.

यह पूरा मामला शिक्षा विभाग की वित्तीय व्यवस्था और निगरानी प्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा रहा है. आने वाले समय में जांच रिपोर्ट से यह स्पष्ट होगा कि दस्तावेजों की कमी महज लापरवाही है या किसी बड़े वित्तीय अनियमितता की ओर इशारा करती है.










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