झारखंड और बिहार में चने की खेती किसान बड़े पैमाने पर करते हैं. यह फसल कम लागत में अच्छी आमदनी देने वाली मानी जाती है. रबी मौसम की यह प्रमुख दलहनी फसल मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के साथ-साथ किसानों की आय का अहम स्रोत भी है. लेकिन अधिक उत्पादन के लिए खेती में वैज्ञानिक तरीकों को अपनाना बेहद जरूरी है.
चना ऐसी फसल है जिसमें अधिक पानी की जरूरत नहीं होती, लेकिन सही समय पर पटवन करने से उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि होती है. कृषि विशेषज्ञों के अनुसार पहली पटवन फूल आने से पहले अवश्य करनी चाहिए. इसके बाद पॉड फॉर्मेशन (फल बनने) के बाद दूसरी पटवन बेहद जरूरी होती है. काली मिट्टी वाले क्षेत्रों में यदि नमी की कमी दिखाई दे, तो एक अतिरिक्त पटवन किया जा सकता है. ध्यान रहे कि जलभराव की स्थिति न बने, क्योंकि इससे फसल को नुकसान हो सकता है.
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फूल आने से पहले चने की फसल में खूंटाई (निराई-गुड़ाई) करना अत्यंत लाभकारी होता है. इससे खेत में खरपतवार समाप्त होते हैं और मिट्टी में हवा का संचार बेहतर होता है. परिणामस्वरूप पौधों की जड़ें मजबूत होती हैं और पोषक तत्वों का अवशोषण सही ढंग से होता है.
निपिंग और फ्लोरियल यूरिया का महत्व
कृषि वैज्ञानिक डॉ. प्रमोद कुमार के अनुसार, चने की फसल में निपिंग (ऊपरी हिस्से की कटाई) करने के बाद फ्लोरियल यूरिया का स्प्रे अवश्य करना चाहिए. इसके लिए 20 ग्राम फ्लोरियल यूरिया प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें. इससे पौधों को आवश्यक नाइट्रोजन और अन्य पोषक तत्व मिलते हैं, जिससे फूल और फल अधिक संख्या में आते हैं.
बेहतर पोषण, बेहतर उत्पादन
फ्लोरियल यूरिया के छिड़काव से चने की फसल को उचित नमी और आवश्यक न्यूट्रिएंट्स मिल जाते हैं. इससे पौधे स्वस्थ रहते हैं, दानों का आकार और वजन बढ़ता है तथा कुल उत्पादन में अच्छी बढ़ोतरी होती है. इसे पटवन के दौरान भी आप कर सकते हैं.
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