फरवरी महीने में तोरई की फसल लगाना फायदे का सौदा साबित हो सकता है. गर्मियों में इसकी मांग बहुत ज्यादा होती है और कम लागत में तैयार होने वाली यह फसल मात्र 50 से 60 दिनों में बंपर पैदावार देकर किसानों को मालामाल कर सकती है.जिला उद्यान अधिकारी डॉ पुनीत कुमार पाठक ने बताया कि अच्छा उत्पादन लेने के लिए सही मिट्टी और सही तापमान का होना बहुत जरूरी है. तोरई की खेती के लिए गर्म और नमी वाली जलवायु सबसे अच्छी मानी जाती है. मिट्टी का pH मान 6.5 से 7.5 के बीच होना चाहिए और खेत में पानी निकलने का अच्छा इंतजाम होना चाहिए ताकि फसल खराब न हो.
IARI द्वारा तैयार की गई 'पूसा सुप्रिया' किस्म उन किसानों के लिए सबसे अच्छी है जो जल्दी कमाई करना चाहते हैं. यह किस्म मात्र 50 दिनों में तोड़ने के लिए तैयार हो जाती है. इसमें बीमारियों से लड़ने की अच्छी क्षमता है और यह 130-140 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन देने की क्षमता रखती है.
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पंत चिकनी तोरई-1 भी एक बहुत ही बेहतरीन किस्म है. पंतनगर विश्वविद्यालय द्वारा विकसित यह किस्म अपने लंबे और बेलनाकार फलों के लिए मशहूर है. 50 से 55 दिनों में तैयार होने वाली यह फसल किसानों को 140 से 170 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक की उपज दे सकती है, जो इसे काफी लोकप्रिय बनाती है.
अगर आप बहुत ज्यादा पैदावार चाहते हैं, तो 'पूसा चिकनी' आपके लिए एक शानदार विकल्प है. हालांकि यह फसल तैयार होने में 60 से 70 दिनों का थोड़ा ज्यादा समय लेती है, लेकिन इसका उत्पादन 150 से 200 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक जा सकता है. इसके फल मध्यम साइज के होते हैं जो बाजार में आसानी से बिक जाते हैं.
भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान, वाराणसी की 'काशी दिव्या' किस्म उन इलाकों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है जहां 'डाउनी मिल्ड्यू' जैसी बीमारियों का खतरा ज्यादा होता है. 60 दिनों में तैयार होने वाली यह किस्म 130 से 160 क्विंटल तक उत्पादन देती है और इसके फल पतले और गुदेदार होते हैं.
कानपुर विश्वविद्यालय द्वारा विकसित 'कल्याणपुर हरी चिकनी' सबसे ज्यादा उत्पादन देने वाली किस्मों में से एक मानी जाती है. अपनी अच्छी क्वालिटी के कारण यह किसानों के बीच बहुत लोकप्रिय है. यह किस्म 200 से 220 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक बंपर पैदावार देकर किसानों की आय को दोगुना करने का दम रखती है. यही वजह है कि किसान इसकी खेती बड़े पैमाने पर करते हैं.
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