परमेश्वर राजपूत, गरियाबंद: सरकार जहां शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता बताने के दावे कर रही है, वहीं गरियाबंद जिले के ग्राम रूवाड़ की तस्वीर इन दावों पर करारा तमाचा है। यहां बच्चे न तो पक्के स्कूल भवन में पढ़ पा रहे हैं, न ही सुरक्षित माहौल में। भीषण गर्मी, कड़ाके की ठंड और बारिश के बीच बच्चे टीन के छप्पर के नीचे बैठकर पढ़ाई करने को मजबूर हैं, वह भी ऐसा छप्पर जो सरकार ने नहीं, बल्कि गांव के गरीब ग्रामीणों ने आपस में चंदा कर बनाया है।यह कोई अस्थायी संकट नहीं, बल्कि सालों से जारी सरकारी उदासीनता का नतीजा है। हैरानी की बात यह है कि ग्राम रूवाड़ में प्राथमिक से लेकर हायर सेकेंडरी तक की कक्षाएं संचालित होती हैं, लेकिन हाई स्कूल का आज तक अपना भवन ही नहीं है।
जर्जर भवन, दो पालियां, जैसे-तैसे पढ़ाई
प्राथमिक शाला का भवन किसी तरह उपयोग लायक है, लेकिन पूर्व माध्यमिक विद्यालय का भवन पूरी तरह जर्जर हो चुका है। बच्चों की जान जोखिम में डालकर कक्षाएं अतिरिक्त कमरों में ठूंसी जा रही हैं। हाई स्कूल भवन के अभाव में स्कूल दो पालियों में चल रहा है, जिससे न पढ़ाई ढंग से हो पा रही है, न ही बच्चों का भविष्य सुरक्षित नजर आ रहा है।
पूरे जिले में यही हाल, कहीं पेड़ के नीचे तो कहीं खंडहर में स्कूल
रूवाड़ अकेला गांव नहीं है। गरियाबंद जिले के कई गांवों में स्कूल भवन केवल कागजों में मौजूद हैं। कहीं बच्चे पेड़ों के नीचे, तो कहीं जर्जर और खतरनाक भवनों में बैठकर पढ़ने को मजबूर हैं। सवाल यह है कि क्या यही है सरकार का “शिक्षा मॉडल” और “सुशासन”?
विधायक का दर्दनाक बयान: “शायद स्कूल भवन के लिए भी परसेंट देना पड़े”
मामले पर क्षेत्रीय विधायक जनक ध्रुव ने खुलकर सिस्टम पर सवाल उठाए। उन्होंने बताया कि स्कूल भवन की मांग को लेकर उन्होंने जिला शिक्षा अधिकारी, शिक्षा मंत्री और विधानसभा सदन तक में आवाज उठाई। शिक्षा मंत्री के हालिया मैनपुर दौरे के दौरान भी ग्रामवासियों ने लिखित आवेदन सौंपा, लेकिन नतीजा शून्य रहा।
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विधायक ने बेहद पीड़ा के साथ कहा—
“अब तो ऐसा लगता है कि बच्चों के स्कूल भवन के लिए भी परसेंट देकर मंजूरी लेनी पड़ेगी। यह बेहद शर्मनाक और दुर्भाग्यपूर्ण है।”
सवालों के घेरे में शासन-प्रशासन
जब सरकार शिक्षा पर करोड़ों खर्च के दावे करती है, तब बच्चों को एक अदद सुरक्षित स्कूल भवन तक क्यों नसीब नहीं?
क्या ग्रामीण बच्चों का भविष्य इतना सस्ता है कि वे टीन के छप्पर और खुले आसमान के नीचे पढ़ने को मजबूर रहें?
अब बड़ा सवाल यह है कि
क्या शासन-प्रशासन इस शर्मनाक हकीकत पर संज्ञान लेगा, या फिर सुशासन के नारों के बीच बच्चों का भविष्य यूं ही तपती धूप और ठिठुरती ठंड में झुलसता रहेगा?
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