अंधेर नगरी चौपट राजा: विजय टांडे के राज में स्थापना शाखा भृत्य के हवाले, राष्ट्रीय आयोजन बना तमाशा

अंधेर नगरी चौपट राजा: विजय टांडे के राज में स्थापना शाखा भृत्य के हवाले, राष्ट्रीय आयोजन बना तमाशा

बिलासपुर: जिला शिक्षा कार्यालय लगातार ऐसे फैसलों के कारण सुर्खियों में है, जो प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि संस्थागत पतन की तस्वीर पेश करते हैं। सर्वाधिक कर्मचारियों और शिक्षकों वाला विभाग आज प्रबंधनहीनता और मनमानी का केंद्र बन गया है।

स्थापना शाखा: बाबू बाहर, भृत्य अंदर

स्थापना शाखा—जहां से हजारों शिक्षकों की वेतन, पदोन्नति, सेवा-पुस्तिका और नियुक्तियों के फैसले होते हैं—अब किसी अधिकृत लिपिक के बजाय भृत्य के भरोसे चल रही है। फोटो और आदेश स्पष्ट करते हैं कि शाखा में बैठा व्यक्ति कोई क्लर्क नहीं, बल्कि भृत्य के पद पर पदस्थ कर्मचारी है

जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय द्वारा बाकायदा आदेश जारी कर भृत्य को स्थापना शाखा में “सहयोग” के नाम पर बैठाया गया। सवाल यह है कि संवेदनशील प्रशासनिक शाखा में भृत्य से किस तरह का सहयोग लिया जा रहा है, और किस नियम के तहत?

छात्रवृत्ति पहले निजी हाथों में, अब स्थापना भी 

यह पहला मौका नहीं है। इससे पहले छात्रवृत्ति जैसे महत्वपूर्ण खंड की जिम्मेदारी एक ऐसे अशासकीय व्यक्ति को दी गई, जो स्वयं चॉइस सेंटर संचालित करता है। अब स्थापना शाखा—जो विभाग की रीढ़ है—उसे भी भृत्य के हवाले कर दिया गया। यह संयोग नहीं, बल्कि खतरनाक कार्यशैली का संकेत है।

भ्रष्टाचार जांच या जिम्मेदारी से पलायन?

सूत्रों के अनुसार अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े एक भ्रष्टाचार प्रकरण की जांच के बाद स्थापना शाखा से बाबू को हटाया गया। लेकिन उसके स्थान पर योग्य लिपिक नियुक्त करने के बजाय भृत्य को बैठा देना, यह बताता है कि सुधार नहीं, बल्कि जिम्मेदारी से बचने का रास्ता चुना गया।

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शिक्षक हताश, व्यवस्था पर करारा कटाक्ष

जिला शिक्षा कार्यालय पहुंचने वाले शिक्षक व्यवस्था को देखकर खुलेआम कह रहे हैं कि “इतनी पढ़ाई कर शिक्षक बने, काश भृत्य बन जाते तो कम से कम स्थापना जैसी मलाईदार शाखा मिल जाती।” यह व्यंग्य नहीं, बल्कि तंत्र पर सीधा प्रहार है।

राष्ट्रीय आयोजन की शर्मिंदगी और नया तमाशा

एक दिन पहले ही 69वीं राष्ट्रीय शालेय क्रीड़ा प्रतियोगिता में भारी अव्यवस्था से बिलासपुर राष्ट्रीय स्तर पर शर्मसार हुआ। अब यह नया आदेश सामने आना साबित करता है कि विजय टांडे के कार्यकाल में विभाग घटनाओं का नहीं, तमाशों का केंद्र बन चुका है।

अयोग्यता या भ्रष्ट मानसिकता—सवाल दोनों पर

स्थापना शाखा को भृत्य के हवाले करना न केवल प्रशासनिक अयोग्यता दर्शाता है, बल्कि नियमों की अनदेखी और जवाबदेही से भागने की मानसिकता को भी उजागर करता है। शिक्षा जैसे संवेदनशील विभाग में यह प्रयोग सीधे-सीधे सिस्टम से खिलवाड़ है।

 

 










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