बिलासपुर : छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कॉर्पोरेशन CGMSC एक बार फिर अपनी कार्यप्रणाली को लेकर हाई कोर्ट की कठोर टिप्पणी का सामना कर रहा है। जशपुर जिले में अस्पताल निर्माण से जुड़े एक टेंडर मामले में हाई कोर्ट ने निगम की भूमिका को मनमानी और पक्षपातपूर्ण मानते हुए कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने याचिकाकर्ता के साथ हुए अन्याय को स्वीकार करते हुए CGMSC को एक लाख रुपये क्षतिपूर्ति देने का निर्देश दिया है।
मामला जशपुर जिले के पत्थलगांव विकासखंड में 50 बिस्तरों वाले अस्पताल के निर्माण से जुड़ा है। CGMSC द्वारा इस परियोजना के लिए ई-टेंडर जारी किया गया था, जिसकी अनुमानित लागत करीब 4 करोड़ रुपये निर्धारित की गई थी। इस निविदा प्रक्रिया में रायगढ़ जिले के एक ठेकेदार द्वारा सबसे कम दर की वित्तीय बोली प्रस्तुत की गई थी, जो सरकारी खजाने के लिए अधिक लाभकारी मानी जा रही थी।
याचिकाकर्ता का आरोप था कि तकनीकी रूप से पात्र होने के बावजूद उसकी वित्तीय बोली को खोले बिना ही प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया। इसके विपरीत, अधिक दर वाली बोली लगाने वाले ठेकेदार को सफल घोषित कर दिया गया। निगम की ओर से बाद में ई-मेल के माध्यम से यह तर्क दिया गया कि आवश्यक स्पष्टीकरण नहीं देने के कारण याचिकाकर्ता को अयोग्य ठहराया गया, जिसे अदालत ने रिकॉर्ड के आधार पर अविश्वसनीय माना।
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सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि समान दस्तावेजों और प्रमाणपत्रों के आधार पर उसी याचिकाकर्ता को राज्य के एक अन्य जिले में बड़े निर्माण कार्य के लिए योग्य माना गया था। इससे यह स्पष्ट हुआ कि जशपुर के टेंडर में अपनाई गई प्रक्रिया समानता और निष्पक्षता के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं थी।
हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने टिप्पणी करते हुए कहा कि टेंडर प्रक्रिया में पारदर्शिता का गंभीर अभाव है और यह समान अवसर के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन है। हालांकि, चूंकि अस्पताल निर्माण कार्य शुरू हो चुका है और सार्वजनिक हित इससे जुड़ा हुआ है, इसलिए कोर्ट ने टेंडर को रद्द नहीं किया।
अदालत ने CGMSC को आदेश दिया कि वह याचिकाकर्ता को चार सप्ताह के भीतर एक लाख रुपये क्षतिपूर्ति के रूप में भुगतान करे। निर्धारित समय सीमा में भुगतान नहीं होने की स्थिति में राशि पर वार्षिक छह प्रतिशत ब्याज भी देना होगा।
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