नई दिल्ली: भारत जैसे देश में, जहां कुछ साल पहले तक टीवी पर सैनिटरी पैड का विज्ञापन आने पर लोग चैनल बदल देते थे, आज वहां ‘मेंस्ट्रुअल हेल्थ’ (मासिक धर्म स्वास्थ्य) पर चर्चा हो रही है।बीते 30 जनवरी को एक याचिका पर निर्णय देते हुए देश की सबसे बड़ी अदालत ने इसे ‘मौलिक अधिकार’ के रूप में परिभाषित किया। यह बदलाव रातोंरात नहीं आया, दरअसल सामाजिक कार्यकर्ताओं की कोशिश के साथ-साथ सिनेमा ने भी इसे जिम्मेदारी के रूप में देखा है।
पैडमैन बनी क्रांतिकारी चुनौती
इस संदर्भ में बीता एक दशक महत्वपूर्ण रहा है, जब मुख्यधारा की फिल्मों में इस विषय को उठाया गया। ‘पैडमैन’ और वह क्रांतिकारी चुनौती जब हम मासिक धर्म और सिनेमा की बात करते हैं, तो सबसे बड़ा नाम ‘पैडमैन’ (2018) का आता है, जो नौ फरवरी को प्रदर्शित हुई थी।
फिल्म को लेकर नहीं उठाना चाहता था कोई जोखिम
सस्ते-सर्वसुलभ सैनिटरी पैड बनाने वाले अरुणाचलम मुरुगनाथम के जीवन पर आधारित इस फिल्म को बनाना और पर्दे तक लाना कोई आसान काम नहीं था। अक्षय कुमार और ट्विंकल खन्ना के लिए इस फिल्म को बनाना एक बड़ा जोखिम था। फिल्म के निर्माण के दौरान कई चुनौतियां आईं, बॉलीवुड में कोई भी बड़ा सुपरस्टार ऐसे विषय पर फिल्म करने को तैयार नहीं था।
पैडमैन का हुआ था विरोध
इसे जुगुप्सा जनक या महिलाओं का निजी मामला समझा जाता था। जब फिल्म की शूटिंग शुरू हुई, तो कई ग्रामीण इलाकों में लोगों ने विरोध किया। फिल्म निर्माताओं को डर था कि क्या सेंसर बोर्ड इसे ‘ए’ सर्टिफिकेट देगा? लेकिन फिल्म का उद्देश्य इतना नेक और आर. बाल्की का निर्देशन इतना संवेदनशील था कि इसे न केवल सराहा गया, बल्कि टैक्स फ्री भी किया गया।
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पैडमैन से बदली लोगों की सोच
‘पैडमैन’ ने वह काम किया जो दशकों से स्वास्थ्य विभाग नहीं कर पाया था, इसने पीरियड्स को ‘ड्राइंग रूम’ की चर्चा का हिस्सा बना दिया। फिल्म के अंत में अक्षय कुमार का संवाद, ‘अमेरिका के पास सुपरमैन है, बैटमैन है... पर इंडिया के पास पैडमैन है,’ आज भी रोंगटे खड़े कर देता है।
ग्रामीण भारत की कड़वी सच्चाई
‘पैडमैन’ से ठीक पहले 2017 में एक छोटे बजट की फिल्म आई थी, ‘फुल्लू’। शारिब हाशमी अभिनीत ‘फुल्लू’ ने उन ग्रामीण क्षेत्रों की हकीकत दिखाई जहां आज भी महिलाएं पुराने गंदे कपड़े, राख या रेत का इस्तेमाल करती हैं। अभिषेक सक्सेना निर्देशित यह फिल्म दिखाती है कि कैसे अज्ञानता के कारण महिलाएं गंभीर बीमारियों का शिकार हो जाती हैं।
फिल्म खास सफलता हासिल नहीं कर सकी, मगर इसने समाज को वो आइना दिखाने की शुरुआत जरूर की कि जिसे हम शर्म समझ रहे हैं, वह दरअसल एक जानलेवा लापरवाही है।
ऑस्कर की चमक
मासिक धर्म से जुड़ी हिचक तोड़ने की इन सिनेमाई कोशिशों को वैश्विक पहचान तब मिली जब हापुड़ के एक गांव की महिलाओं पर आधारित डाक्यूमेंट्री ‘पीरियड. एंड आफ सेंटेंस’ ने वर्ष 2018 के लिए ऑस्कर जीता। इसने दिखाया कि कैसे एक गांव की महिलाएं पैड बनाने की मशीन लगाकर न केवल आत्मनिर्भर बनीं, बल्कि उन्होंने ‘पीरियड्स’ शब्द के साथ जुड़े कलंक को भी धो डाला।
अगर पैडमैन अरुणाचलम मुरुगनाथम के जीवन पर आधारित थी तो डाक्यूमेंट्री में वे स्वयं उपस्थित थे। ऑस्कर के मंच पर जब इस डाक्यूमेंट्री की ईरानी मूल की अमेरिकी निर्देशिका रायका जेहताबची ने कहा, ‘मुझे विश्वास नहीं हो रहा कि पीरियड्स पर बनी फिल्म ने ऑस्कर जीता है,’ तो पूरी दुनिया ने भारत के इस बदलाव को सलाम किया।
बदलता समाज और काली थैली का अंत
सालों से मेडिकल स्टोर पर पैड को अखबार में लपेटकर और फिर काली थैली में डालकर ऐसे दिया जाता था जैसे कोई अपराध हो। टीवी विज्ञापनों ने इस टैबू पर बात शुरु की लेकिन सिनेमा की संवेदनशीलता ने शहरी भारत में काली थैली की इन रूढ़ियों को काफी हद तक तोड़ दिया है।
जहां ‘पैडमैन’ ने एक बड़े बदलाव की बात की थी, तो वहीं ‘फुल्लू’ फिल्म ने उन पुरुषों की कहानी कही जो अपनी पत्नी के दर्द को समझते हैं लेकिन समाज के डर से कुछ बोल नहीं पाते। 2022 में आई आयुष्मान खुराना अभिनीत फिल्म ‘डॉक्टर जी’ ने इस चर्चा को एक कदम और आगे बढ़ाया। इसमें दिखाया गया कि कैसे एक पुरुष गाइनेकोलाजिस्ट (स्त्री रोग विशेषज्ञ) को महिलाओं के स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशील होना चाहिए।
यह फिल्में केवल मनोरंजन नहीं हैं; इसलिए इन्हें हिट या फ्लॉप के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। दरअसल ये पुरुषों के लिए संवेदनशीलता की कक्षा की तरह हैं। इनका कुछ तो योगदान है कि अब पुरुष अपनी बहनों, पत्नी और बेटियों के स्वास्थ्य पर खुलकर बात करने लगे हैं।
पैडमैन की इंस्पिरेशन मुरुगनाथम
बदलाव की शुरुआत हमेशा छोटी सी आवाज से होती है। अरुणाचलम मुरुगनाथम की वह छोटी सी मशीन, अक्षय कुमार का पर्दे पर पैड लेकर दौड़ना और सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला- ये सब कड़ियां आपस में जुड़ी हुई हैं। चुनौती अभी खत्म नहीं हुई है। लेकिन अब हमारे पास कानून की ताकत है और है सिनेमा की संवेदनशीलता।
उम्मीद करें कि अब कोई लड़की पीरियड्स की वजह से स्कूल नहीं छोड़ेगी, और न ही कोई समाज इसे ‘अपवित्र’ कहेगा। सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक हस्तक्षेप
सिनेमा ने जो माहौल बनाया, उसे कानूनी मजबूती दी है भारत के सुप्रीम कोर्ट ने। 30 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मासिक धर्म स्वच्छता संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत ‘सम्मान से जीने के अधिकार’ का हिस्सा है।
इस फैसले के बादः
1.अब हर स्कूल में लड़कियों के लिए अलग और साफ टायलेट होना अनिवार्य है।
2. कक्षा 6 से 12 तक की लड़कियों को मुफ्त पैड देना सरकार की कानूनी जिम्मेदारी है।
3. स्कूलों में पैड डिस्पोज करने की मशीनें (इंसीनरेटर) लगाना जरूरी है।
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