दिल ही नहीं दिमाग का भी दुश्मन है फैट:शरीर में लिपिड का असंतुलन आपको बना सकता है पार्किंसंस का शिकार

दिल ही नहीं दिमाग का भी दुश्मन है फैट:शरीर में लिपिड का असंतुलन आपको बना सकता है पार्किंसंस का शिकार

हम अक्सर यही मानते हैं कि शरीर में फैट या 'लिपिड' का संतुलन बिगड़ने का मतलब है- हार्ट अटैक या स्ट्रोक का डर, लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह असंतुलन आपके दिमाग को भी बीमार कर सकता है? हाल ही में हुए एक चौंकाने वाले अध्ययन ने खुलासा किया है कि लिपिड तंत्र में गड़बड़ी पार्किंसंस रोग के खतरे को बढ़ा सकती है। अमेरिका में हुई इस नई रिसर्च ने बीमारी की जड़ तक पहुंचने के लिए एक नया दरवाजा खोल दिया है।

क्या है लिपिड और क्यों है यह जरूरी?

आसान भाषा में समझें तो लिपिड एक प्रकार का वसायुक्त फैटी कंपाउंड है। आम तौर पर माना जाता है कि शरीर में इसका असंतुलन होने से हृदय रोग या स्ट्रोक का खतरा रहता है, लेकिन अब यह बात सामने आई है कि इसका संबंध हमारे मस्तिष्क के स्वास्थ्य से भी गहरा है।

अमेरिका में हुआ यह अध्ययन

इस शोध को अमेरिका के बेयलर कॉलेज ऑफ मेडिसिन और डंकन न्यूरोलॉजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों की टीम ने अंजाम दिया है। शोधकर्ताओं ने अपना पूरा ध्यान 'एसपीटीएसएसबी' (SPTSSB) नामक एक जीन पर केंद्रित किया। यह जीन पार्किंसंस के जोखिम से जुड़ा हुआ एक सामान्य जीन है। इसका मुख्य काम 'स्पिंगोलिपिड्स' के उत्पादन के पहले चरण को नियंत्रित करना है। बता दें कि स्पिंगोलिपिड्स वे तत्व हैं जो हमारी कोशिकाओं के बढ़ने और उनकी मृत्यु की प्रक्रिया में शामिल होते हैं।

जीन का वह रूप जो बढ़ाता है खतरा

अध्ययन के दौरान वैज्ञानिकों ने 'एसपीटीएसएसबी' जीन के एक विशेष रूप 'आरएस 1450522' की जांच की। उन्होंने पाया कि यह रूप न्यूरोडीजेनेरेटिव स्थिति (मस्तिष्क की कोशिकाओं का नष्ट होना) के जोखिम को बढ़ाने से जुड़ा हुआ है।

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शोध में यह बात सामने आई कि जिन लोगों के शरीर में जीन का यह 'आरएस 1450522' रूप मौजूद था, उनके मस्तिष्क (विशेषकर न्यूरॉन्स) में 'एसपीटीएसएसबी' प्रोटीन की मात्रा काफी बढ़ी हुई थी। इतना ही नहीं, उनके रक्त में स्पिंगोलिपिड्स का स्तर भी उन लोगों की तुलना में अधिक था जिनके पास जीन का यह रूप नहीं था।

शोध के नतीजे

अध्ययन के परिणाम काफी स्पष्ट थे। शोधकर्ताओं ने कुल 62 प्रकार के स्पिंगोलिपिड्स को मापा, जिनमें से लगभग 23 प्रतिशत में महत्वपूर्ण बदलाव देखे गए। इस अध्ययन ने यह साबित कर दिया है कि पार्किंसंस रोग के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाने वाले जीन, शरीर के लिपिड मेटाबोलिज्म में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं।










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