नई दिल्ली: कुछ घाव कभी नहीं भरते, और कुछ कहानियां कभी मिटने का नाम नहीं लेतीं। 1947 का विभाजन, भारतीय इतिहास की सबसे दर्दनाक घटनाओं में से एक है, जिसे सिनेमा के माध्यम से बार-बार दिखाया गया है। हर फिल्म निर्माता ने उस युग के दुख, हिंसा और मानवीय लचीलेपन को अलग-अलग लेंस लगाकर अपने तरीके से उकेरने की कोशिश की है।
विभाजन की सच्चाई की बयां
हम बात कर रहे हैं साल 1988 में आई गोविंद निहलानी की फिल्म 'तमस' की।'तमस' एक ऐतिहासिक फिल्म थी। यह फिल्म विभाजन को उसके वास्तविक स्वरूप में दिखाने से नहीं कतराई जिसमें कच्ची, विनाशकारी और दर्दनाक सच्चाई को दिखाया गया। भीष्म साहनी के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित यह फिल्म बिना किसी लाग-लपेट के उस बेहद भयावह सच्चाई को दिखाया। इसमें सांप्रदायिक हिंसा को एक ऐसी घटना के रूप में चित्रित किया गया था जिसने रातोंरात जिंदगियां तबाह कर दीं।
कौन-कौन से कलाकार आए नजर
इस फिल्म में ओम पुरी, दीप्ति शाह, दीना पाठक, भीष्म साहनी, अमरीश पुरी, नफीसा अली और ए. के. हंगल ने काम किया था और यह बटवारे के समय हिन्दू-मुस्लिम दंगों के बीच पनप रही कहानियों को छूती हुई बेहतरीन फिल्म थी।
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फिल्म की कहानी एक छोटी सी घटना से शुरू होती है जिसमें ठेकेदार (पंकज कपूर), नत्थू (ओम पुरी) को सूअर मारने के लिए कहता है। पहले तो वो इसके लिए मना करता लेकिन बाद में बड़ी जदोजहद के बाद मान जाता है। इस घटना के बाद पूरे शहर में दंगे भड़क जाते हैं जिसे कुछ नेता और धर्म प्रचारक इसे भुनाने की कोशिश करते हैं।
फिल्म को लेकर हुआ था विवाद
1986 में, फिल्म को उस समय के एकमात्र उपलब्ध चैनल दूरदर्शन पर शो के तौर पर प्रसारित किया गया था और यह विवादों में आ गई थी। यह फिल्म ऐसे समय में दिखाई गई थी जब भारत में हिंदू राष्ट्रवाद का उदय हो रहा था। सांप्रदायिक तनाव और हिंसा के चित्रण के कारण बॉम्बे हाईकोर्ट ने इसके प्रसारण पर रोक लगाने का स्टे ऑर्डर दिया था, जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया। कोर्ट ने इसे सांप्रदायिकता के खिलाफ एक सच्चाई का चित्रण माना।
इस शो ने उस दौर में तीन पुरस्कार जीते थे। साल 1988 के नेशनल अवॉर्ड के तहत इसे नरगिस दत्त अवॉर्ड फॉर बेस्ट फीचर फिल्म ऑन नेशनल इंटीग्रेशन का अवॉर्ड मिला। शो की एक्ट्रेस सुरेखा सीकरी ने बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस का खिताब जीता और वनराज भाटिया ने बेस्ट म्यूजिक डायरेक्शन के लिए अवॉर्ड हासिल किया।
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