परमेश्वर राजपूत,गरियाबंद : प्रयोग समाज सेवी संस्था तिल्दा द्वारा संचालित महिला भूमि अधिकार एवं आजीविका परियोजना के अंतर्गत ग्राम कासरबाय हरदी में गरियाबंद ब्लॉक की 40 महिला किसानों को जलवायु अनुकूल जैविक खेती का तीन दिवसीय सघन प्रशिक्षण दिया गया। प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ पूर्व सरपंच दयालाल ध्रुव, बोधन ध्रुव, एकता परिषद के ब्लॉक संयोजक राजेंद्र सिंह राजपूत, जिला समन्वयक नूरानी जैन तथा प्रशिक्षक थानेंद्र साहू एवं दीपक द्वारा महात्मा गांधी के छायाचित्र पर पूजा-अर्चना कर किया गया। प्रशिक्षकों थानेंद्र साहू और दीपक सारवा ने बताया कि हमारे पूर्वज बिना प्रकृति को नुकसान पहुंचाए धान, दलहन और तिलहन की खेती करते थे, जिससे भूमि की उर्वरता और पर्यावरण संतुलित रहता था। वर्तमान में रासायनिक खेती के अत्यधिक उपयोग से कृषि भूमि की गुणवत्ता घट रही है, पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है और मानव स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि इन समस्याओं से बचाव का एकमात्र सशक्त विकल्प जैविक खेती है।
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प्रशिक्षण के दौरान महिला किसानों को जीवामृत, धनजीमृत, बीजामृत बनाने की विधि, तथा रोग-व्याधि नियंत्रण के लिए पंचपरनी और दशपरनी जैविक कीटनाशक तैयार करने की जानकारी दी गई। साथ ही प्रत्येक घर में पोषण बाड़ी विकसित कर वर्षभर सब्जी उत्पादन करने की तकनीक समझाई गई। जैविक उत्पादों की बाजार में बिक्री और उचित मूल्य प्राप्त करने की रणनीति पर भी विस्तार से मार्गदर्शन दिया गया।समापन समारोह में संस्था के अध्यक्ष सीताराम सोनवानी, कोषाध्यक्ष निर्मला कुजूर एवं सपना वर्मा ने कहा कि प्रशिक्षण का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा जब किसान स्वयं जैविक पद्धति अपनाकर गांव के अन्य किसानों को भी इसके लिए प्रेरित करेंगे। इस अवसर पर प्रशिक्षक थानेंद्र साहू एवं दीपक का शाल व श्रीफल भेंटकर सम्मान किया गया।
कार्यक्रम में जिला समन्वयक नूरानी जैन, सुनीता कुर्रे, चित्ररेखा बघेल, जानकी जगत, रेवती यादव, डिलेश, डिंपल नेताम, दयावती नागेश, ढेलऊ राम साहू, भूपेंद्र साहू, हनुमान सिंह ध्रुव, मालती, ममता देवदास, सूकारोबाई, सातोंबाई, खेमलता ध्रुव, मानकीबाई, रानू ध्रुव, पुष्पा, दसोदा, भानुमति, खुमेश्वरी सहित बड़ी संख्या में महिला किसानों ने भाग लेकर प्रशिक्षण प्राप्त किया।
यह प्रशिक्षण न केवल किसानों को रासायनिक खेती से होने वाले नुकसान के प्रति जागरूक करने में सफल रहा, बल्कि जलवायु परिवर्तन के दौर में टिकाऊ और लाभकारी कृषि मॉडल की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल साबित हुआ।
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