नई दिल्ली : फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों भारत में हैं। उनकी यात्रा से पहले ही भारत की रक्षा खरीद परिषद (डीएसी) ने 114 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद के सौदे को मंजूरी दी है। माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राष्ट्रपति मैक्रों के बीच करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये के इस रक्षा सौदे को अंतिम रूप देने पर भी बातचीत होगी। अगले कुछ महीनों में राफेल सौदे पर हस्ताक्षर हो सकते हैं।आइये जानते हैं कि भारत ने अब तक के सबसे बड़े रक्षा सौदे के लिए राफेल लड़ाकू विमान और फ्रांस पर ही क्यों भरोसा जताया और भू-राजनीतिक परिदृश्य के लिहाज से इसमें क्या संकेत छिपे हैं?
ऑपरेशन सिंदूर में शानदार प्रदर्शन
भारतीय वायुसेना के बेड़े में 36 राफेल पहले से हैं। इन लड़ाकू विमानों ने मई में पाकिस्तान के खिलाफ ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अपनी क्षमता साबित की है। इसके अलावा फ्रांस की वायुसेना के लिए भी राफेल विमान कई देशों में ऑपरेशन को अंजाम दे चुके हैं। इसकी क्षमता को देखते हुए 10 से अधिक देश राफेल को या तो अपनी वायुसेना में शामिल कर चुके हैं या खरीदने का आर्डर दे चुके हैं।
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वर्तमान में राफेल बनाने वाली कंपनी डसाल्ट एविएशन के पास करीब 500 विमानों की लंबी आर्डर बुक है। इसे पूरा करने में कंपनी को करीब एक दशक का समय लग सकता है।
भारत में राफेल का संयुक्त उत्पादन
प्रस्तावित सौदे के तहत करीब 18 विमान सीधे फ्रांस से रेडी टू फ्लाई कंडीशन में आएंगे। बाकी लड़ाकू विमान भारत में बनेंगे। इसके लिए यहां असेंबली लाइन स्थापित करने का काम चल रहा है। इन विमानों में 40 से 50 प्रतिशत सामग्री स्वदेशी होगी। इसका मतलब है कि इससे भारत में राफेल जैसा अत्याधुनिक लड़ाकू विमान बनाने के लिए एक इकोसिस्टम तैयार होगा। आने वाले समय में भारत में बने राफेल विमानों को डसाल्ट दूसरे देशों को निर्यात भी कर सकती है। इसका फायदा भी रक्षा क्षेत्र में काम कर रही भारतीय कंपनियों को मिलेगा।
रख-रखाव होगा आसान
राफेल विमानों के इंजन बनाने वाली कंपनी सफ्रान हैदराबाद में एमआरओ फैसिलिटी तैयार कर रही है। इसका मतलब है कि अगर राफेल विमानों के इंजन को ओवरहाल करना है तो इसे फ्रांस नहीं ले जाना होगा। यह काम भारत में ही जाएगा।
इसके अलावा दूसरे देशों के पास जो राफेल हैं, उनके लिए भी यह फैसिलिटी उपयोगी होगी। भारतीय वायुसेना पहले से राफेल उड़ा रही है। ऐसे में हमारे पायलट पहले से इससे परिचित हैं और रखरखाव के लिए बुनियादी इंफ्रास्ट्रक्चर पहले से मौजूद हैं। ऐसे में पायलटों के प्रशिक्षण और दूसरे इंफ्रास्ट्रक्चर पर अलग से निवेश नहीं करना पड़ेगा।
प्लेटफार्म साथ शर्तें नहीं
फ्रांस के साथ रक्षा सौदे में भारत इसलिए भी सहज है क्योंकि फ्रांस अपने रक्षा उपकरणों के साथ शर्तें नहीं लगाता है कि आप इसका इस्तेमाल किसके खिलाफ करेंगे या नहीं करेंगे। फ्रांस की यह नीति भारत की रणनीतिक स्वायत्तता के लिए अनुकूल है। इसलिए भी एक भरोसेमंद रक्षा आपूर्तिकर्ता के तौर पर भारत का अनुभव फ्रांस के साथ अच्छा रहा है।
रक्षा आपूर्ति में विविधता
भारत रक्षा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है लेकिन अभी इसमें करीब एक दशक का समय लग सकता है। तब तक के लिए भारत रक्षा आपूर्ति में विविधता पर जोर रहा है। इसका मतलब है कि किसी एक देश पर निर्भर के बजाए कई देशों से रक्षा उपकरण खरीदना।
इसका यह भी मतलब है कि भारत रूस से अपनी निर्भरता कम करना चाहता है। वर्तमान में भारत रूस के अलावा, फ्रांस, अमेरिका और इजरायल के अलावा दूसरे देशों से भी रक्षा साजो सामान खरीद रहा है। इसका फायदा यह है कि कोई देश रक्षा जरूरतों को हथियार बना कर हमारी बांह नहीं मरोड़ सकता है।
भरोसेमंद आपूर्तिकर्ता
फ्रांस भारत के लिए एक भरोसेमंद मित्र और रक्षा आपूर्तिकर्ता रहा है। 1980 में अमेरिका ने पाकिस्तान को अत्याधुनिक लड़ाकू विमान एफ-16 बेचने का फैसला किया। पाकिस्तानी वायुसेना में एफ-16 आने से उसकी क्षमता काफी अधिक बढ़ने वाली थी।
ऐसे में भारतीय वायुसेना को फ्रांस के लड़ाकू विमान मिराज-2000 में ही वह क्षमता नजर आई जो एफ-16 का मुकाबला कर सकता था। भारत ने फ्रांस से 40 मिराज लड़ाकू विमान खरीदे और फ्रांस ने भी भारत की जरूरतों को समझते हुए विमानों की आपूर्ति की। उस समय कोई और पश्चिमी देश भारत को अत्याधुनिक हथियार बेचने के लिए तैयार नहीं था।
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