आम के तने से गोंद का रिसाव सामान्य नहीं, न करें नजरअंदाज, ये वैज्ञानिक उपाय अपनाकर बचाएं बागान

आम के तने से गोंद का रिसाव सामान्य नहीं, न करें नजरअंदाज, ये वैज्ञानिक उपाय अपनाकर बचाएं बागान

आम को फलों का राजा कहा जाता है, किंतु इसकी सतत उत्पादकता अनेक रोगों से प्रभावित होती है. इन्हीं में गमोसिस एक अत्यंत गंभीर एवं व्यापक रोग है, जो देश के लगभग सभी आम उत्पादक क्षेत्रों- विशेषकर बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और पश्चिम बंगाल—में देखा जाता है. यदि समय रहते इसका वैज्ञानिक प्रबंधन न किया जाए तो पेड़ की बढ़वार रुक जाती है, फलन घटता है और अंततः पूरा वृक्ष सूख भी सकता है.

गमोसिस रोग का कारण एवं रोगजनक

गमोसिस एक फफूंदजनित रोग है. इसके प्रमुख रोगकारक निम्न हैं:

  • Phytophthora palmivora / P. nicotianae (सबसे प्रमुख)

  • Botryodiplodia theobromae

  • Fusarium प्रजातियाँ

इनमें Phytophthora जलभराव, भारी मिट्टी और अधिक आर्द्रता की स्थिति में तीव्र गति से फैलता है. हाल के अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ है कि जलवायु परिवर्तन के कारण अनियमित वर्षा और लंबे समय तक नमी बने रहने से गमोसिस की तीव्रता बढ़ी है.

गमोसिस रोग के प्रमुख लक्षण

  1. तनों व शाखाओं से गोंद का रिसाव – छाल के नीचे से पीला भूरा, चिपचिपा गोंद निकलना, जो सूखकर काला हो जाता है.

  2. छाल का फटना व सड़न – प्रभावित भागों पर दरारें पड़ जाती हैं.

  3. पत्तियों का पीला पड़ना – पोषण अवशोषण बाधित होने से पत्तियाँ पीली होकर झड़ने लगती हैं.

  4. फल झड़ना – कच्चे फल असमय गिर जाते हैं, जिससे उपज में भारी कमी आती है.

  5. जड़ सड़न व वृक्ष का सूखना – गंभीर अवस्था में जड़ें सड़ जाती हैं और पेड़ धीरे धीरे मर जाता है.

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गमोसिस रोग के फैलाव के प्रमुख कारण

  • अत्यधिक सिंचाई एवं जल जमाव

  • भारी व खराब जलनिकास वाली मिट्टी

  • तनों पर यांत्रिक चोट या छाल का छिलना

  • जस्ता, बोरॉन एवं पोटाश की कमी

  • संक्रमित नर्सरी पौधों का उपयोग

गमोसिस रोग का एकीकृत प्रबंधन (Integrated Disease Management)

1. कल्चरल प्रबंधन

  • बाग में उचित जल निकास की व्यवस्था करें, नालियाँ अवश्य बनाएं.

  • पेड़ों के बीच संतुलित दूरी रखें ताकि वायु संचार बना रहे.

  • संक्रमित शाखाओं व छाल को खुरचकर हटा दें और नष्ट करें.

  • तनों के चारों ओर मिट्टी चढ़ाकर (earthing up) नमी का सीधा संपर्क कम करें.

2. जैविक प्रबंधन

  • Trichoderma harzianum / T. viride @ 50–100 ग्राम प्रति पेड़ को 10–20 किग्रा सड़ी गोबर खाद में मिलाकर जड़ क्षेत्र में डालें.

  • मायकोराइजा के प्रयोग से जड़ों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है. इसके लिए पुराने स्वस्थ आम बाग की 5 किग्रा मिट्टी नए या रोगग्रस्त पेड़ों के चारों ओर फैलाएं.

  • नीम तेल (5%) या नीम लहसुन अर्क का छिड़काव सहायक होता है.

3. रासायनिक प्रबंधन

 (वैज्ञानिक अनुशंसा के अनुसार)

  • तने की छाल खुरचकर Copper oxychloride 3 ग्राम/लीटर का लेप करें.

  • Metalaxyl + Mancozeb (2 ग्राम/लीटर) का छिड़काव या ड्रेंचिंग.

  • गंभीर स्थिति में Ridomil Gold 25 WP @ 1.5–2 ग्राम/लीटर से मिट्टी ड्रेंचिंग.

  • यदि पेड़ सूखने लगे हों तो Roko M (3 ग्राम/लीटर) से 30 लीटर घोल प्रति वयस्क पेड़ ड्रेंचिंग करें, 10 दिन बाद पुनः दोहराएं.

4. बोर्डो पेस्ट द्वारा प्रभावी संरक्षण

बोर्डो पेस्ट गमोसिस के साथ साथ शीर्ष मरण, छाल फटना एवं अन्य फफूंद रोगों से सुरक्षा देता है.

 विधि

  • कॉपर सल्फेट 1 किग्रा + बिना बुझा चूना 1 किग्रा + पानी 10 लीटर

  • कॉपर सल्फेट व चूने को अलग अलग घोलकर लकड़ी की छड़ी से मिलाएँ.

  • तने पर 5–5.5 फीट ऊँचाई तक पुताई करें.

समय

  • पहली बार: जुलाई–अगस्त

  • दूसरी बार: फरवरी–मार्च

5. पोषण प्रबंधन

10 वर्ष से अधिक आयु के पेड़ों में प्रति पेड़ लगभग 1 किग्रा नत्रजन, 500 ग्राम फास्फोरस एवं 800 ग्राम पोटाश रिंग विधि से दें.

  • जिंक सल्फेट (0.5%) एवं बोरॉन (0.1%) का पर्णीय छिड़काव करें.

  • जैविक खाद, वर्मी कम्पोस्ट एवं हरी खाद का नियमित प्रयोग करें.

सावधानियाँ

  • जल जमाव बिल्कुल न होने दें.

  • तनों पर किसी भी प्रकार की चोट को तुरंत बोर्डो पेस्ट से ढकें.

  • रोग के प्रारंभिक लक्षण दिखते ही उपचार करें.

  • अत्यधिक संक्रमित पेड़ों को बाग से निकालना बेहतर होता है.

क्षेत्र-विशेष परिप्रेक्ष्य: बिहार एवं पूर्वी भारत

बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, झारखंड, पश्चिम बंगाल एवं ओडिशा जैसे पूर्वी भारतीय राज्यों में आम की खेती प्रायः दोमट से भारी दोमट मिट्टियों, अधिक वर्षा, उच्च आर्द्रता एवं कई स्थानों पर जल जमाव की समस्या के साथ की जाती है. इन परिस्थितियों में Phytophthora जनित गमोसिस रोग की तीव्रता अपेक्षाकृत अधिक पाई जाती है. विशेष रूप से दियारा क्षेत्र, निचले मैदानी भाग एवं नदी-तटीय क्षेत्रों में यह रोग तेजी से फैलता है.

इस क्षेत्र में गमोसिस प्रबंधन हेतु निम्न बिंदुओं पर विशेष ध्यान आवश्यक है:

  • मानसून पूर्व एवं पश्चात जल निकास की अनिवार्य व्यवस्था.

  • वर्षा ऋतु में तनों के चारों ओर मिट्टी हटाकर नमी के सीधे संपर्क से बचाव.

  • जुलाई–अगस्त में बोर्डो पेस्ट की पुताई को प्राथमिकता.

  • पोटाश एवं सूक्ष्म पोषक तत्वों (जिंक, बोरॉन) का संतुलित उपयोग.

  • जैव एजेंट्स (ट्राइकोडर्मा, मायकोराइजा) का नियमित प्रयोग.

इन उपायों को अपनाकर बिहार एवं पूर्वी भारत की परिस्थितियों में आम के बागों को गमोसिस से काफी हद तक सुरक्षित रखा जा सकता है.

अंत में...

गमोसिस रोग आम उत्पादन के लिए एक गंभीर चुनौती है, किंतु समन्वित एवं वैज्ञानिक प्रबंधन अपनाकर इसे प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया जा सकता है. समय पर जल प्रबंधन, संतुलित पोषण, जैव-एजेंट्स और आवश्यकता अनुसार रसायनों का विवेकपूर्ण उपयोग आम के बागों को दीर्घकाल तक स्वस्थ एवं उत्पादक बनाए रखता है. यही सतत एवं लाभकारी आम उत्पादन का मूल मंत्र है.

 










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