मुखिया के मुखारी -जो अपने को नहीं समझ पायें वो लोकतंत्र को क्या समझेंगे?

मुखिया के मुखारी -जो अपने को नहीं समझ पायें वो लोकतंत्र को क्या समझेंगे?

डरी हुई कांग्रेस डर के आगे जीत ढूंढ रही है ,अपने ही झंझावातों में उलझतें जा रही है, जीत एकतरफा हो रही है, चुनाव दर चुनाव हारती इंडी गठबंधन मतदाताओं के साथ कोई बंधन बना ही नही पा रही, हस्तिनापुर दिल्ली हो गया राजतंत्र लोकतंत्र में परिवर्तित हो गया, पर आज की गांधारी को दुर्योधन आज भी सुयोधन लग रहा,करनी, कर्मगति ,संगती सबका इतिहास बता रहा की वर्तमान खंडित और भविष्य धूमिल है, क्योकि कर्म से ज्यादा चाटुकारिता को प्रश्रय मिल रहा, जिन्हें देश के इतिहास संस्कृति और परम्पराओं से आत्मगौरव का बोध नहीं होता उन्हें मत देकर मतदाता अपराध बोध से क्यों ग्रसित होगा ,देश में विपक्ष के नेताओं ने अराजकता को ही  प्रजातंत्र की धुरी समझ ली है । दिल्ली और पंजाब में आप पार्टी के उभार ने इसे और पुख्ता किया इस अनुभव को अखिल भारतीय विस्तार देने की कोशिश में राहुल ममता से लेकर स्टालिन तक सब लगें हैं  ।जहाँ संसद में हंगामा उनका हथियार है, तो संसद के बाहर अनर्गल बयानबाजी हो रही है, जन सरोकारों से दूर मैं और मेरी राजनीति में सत्ता येन केन प्रकारेण चाहिए,शिक्षित समाज क्या एक ही डंडे से हांका जा सकता है ,न 1952 वाली दशा है न दिशा और न वैसी राजनितिक फिजा फिर वैसे कैसे परिणाम आयेंगे?

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तबकी चादर कांग्रेस सिकुड़कर अब रुमाल हो गई है उन्हीं के धागों से कई नेताओं ने अपने -अपने राज्यों में सत्ता की नई आसनी बुन ली है ,जिन्होंने कांग्रेस  विरोध में राजनीति शुरू की वो सारे आज कांग्रेस के संग हैं फिर भी कांग्रेस सत्ता को अंग नही लगा पा रही, उदंडता, निकृष्ट भाषा शैली ,विरोध नही दुश्मनी का भाव लिए प्रवक्ताओं की बोली जब निकलती है तो लगता है गोली भी उनकी बोली के आगे शर्मसार हो जाएगी,तथ्यहीन आरोपों से आत्मसंतुष्टि तो मिल सकती है जीत नहीं ,प्रवक्ता अच्छे वक्ता नहीं हैं, इसलिए अपना चुनाव नहीं जीत पा रहें तो पार्टी की जीत में क्या योगदान दे पाएंगे ? चुनाव हारने वाले नेता यदि पार्टी के भाग्य विधाता बने रहेंगे तो पार्टियों का भाग्य कैसे बदलेगा ? गुस्से से भरे तमतमाएं चेहरें किसी को अच्छे नहीं लगते ऐसे लोगो को कौन सत्ता सौपेगा? हिंदुत्व की कब्र खोदने की मानसिकता ने उनकी राजनीतिक कब्र खोद दी फिर भी सबक नहीं लिया जा रहा अंतर्विरोधों से घिरी इन राजनीतिक दलों को स्वहित के लिए सत्ता चाहिए ,जनहित के लिए नहीं सत्ता सुख से परिवार का कोई सदस्य वंचित न रहे सारी कुर्सियां इनके आंगन की गुलाम बनी रहें, जब सबकुछ परिवार का तो फिर परिवार के वोटों से ही चुनाव जीत जाइए ,पहले भारतीय मतदाताओं के विवेक पर इन विवेकहीन नेताओं ने प्रश्न चिन्ह खड़ें किए,मतों को साम्प्रदायिक बताया फिर फ्री बीज की राजनीति पर तंज कसा परिणाम फिर भी सिफर क्योकि इस सफर की शुरुवात भी इन्होंने ही की थी सम्प्रदाय { धर्म } के नाम पर जब देश का बटवारा हुआ तो फिर कैसे राजनीति बिना धर्म हित के हो सकती है बटवारें की त्रासदी ने राष्ट्रवाद को पल्लवित पोषित किया जिसका उभार हमें आज दिख रहा।

नई पीढ़ी की नई सोंच ,नई परिस्थितियों ने हिंदुत्व को नई ऊचाईयां दीं राजनीतिक दशा दिशा ही नहीं बदली सत्ता के ताले बदल गए, जिसकी एक ही कुंजी है हिंदुत्व ,अब जिन्हें बदले हुए दौर का बदलाहट समझ में नही आ रहा उन्हें राजनीतिक बदलाव क्या समझ में आएगा ?जिनकी समझ में सिर्फ परिवार है उनकी समझ में समाज और देश कहाँ से आएगा  ।लड़की हूँ लड़ सकतीं हूँ कह देने से परिणाम नहीं बदल जाते, बोलती आप यूपी में हैं, लड़तीं चुनाव आप केरल से हैं, ये बोलने लड़ने की दुरी बता रही है की घर में भी हैं बहुत सी मज़बूरी है ,अवसाद ग्रस्त व्यक्तित्व के साथ निभा लेना आसान नहीं है, और उसके साथ राजनीति करना और भी दुरूह कार्य है, सत्ता जीत से ही मिलती है और जीत के लिए मत ही नहीं बहुमत जरुरी है ,आप बहुमत को दुतकार रहे अपनी नासमझीं में बहुमत की भावनाओं पर घात कर रहे जिन्होंने महाकुंभ की आलोचना बेवजह की वो राजनीतिक हासिये पर जा रहे लालू परिवार का अवसान देखा सबने कई के आसन्न हैं ,बिना जन भावनाओं के मुद्दे तरासे नहीं जा सकते न बिन मुद्दों के सत्ता परिवर्तन होता है बिना जनमत के न मुद्दा न जीत तो फिर कैसे गूंजेगा आपकी राजनीति का गीत स्वार्थ, लोलुप ,स्वकेंद्रित राजनीति को न लोकतंत्र में चलना है न चलेगा ,इसका अवसान समय के साथ तय है ,कुलश्रेष्ठी लोक तंत्र श्रेष्ठी हो जाएं जरुरी नहीं,क्योकि ----------------जो अपने को नहीं समझ पायें वो लोकतंत्र को क्या समझेंगे?

चोखेलाल

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मुखिया के मुखारी व्यवस्था पर चोट करती चोखेलाल की टिप्पणी










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