क्या इस देश में ऐसे मुसलमान हैं जिनकों नेताओं के श्री राम मंदिर में पूजा करने से ऐतराज है, वों उन नेताओं को वोट नहीं देंगे? क्या यही अवधारणा हिन्दुओं के लिए भी लागु होती है - नहीं क्योंकि सारे नेता दरगाहों पे चादर भेज रहे, इफ्तार पार्टी कर रहे, मस्जिदों में जा रहे ,ऐसा कौन सा मसला है जो इन्हें राम मंदिर जाने से रोकता है? बाबर की मजार पे तीन पीढियां मत्था टेक आई ,क्या इस मानसिकता से मुस्लिम समाज पर तोहमत नही लगाईं जा रही है, क्या उन्हें बेवजह अपने वोटों के लिए हिंदू विरोधी की तरह पेश नही किया जा रहा, ये कौन सी धर्मनिरपेक्षता है की एक तरफ़ा निभाया जा रहा है ? अरब आक्रांताओं के साथ मुस्लिम धर्म का बलात प्रवेश हिन्दुस्तान में हुआ, तलवार की नोक पर धर्मांतरण हुए ,मंदिरों को ध्वस्त किया गया ,जौहर जैसी पीड़ा से देश को गुजरना पड़ा ,धर्म के आधार पर देश का बंटवारा हुआ ,साम्प्रदायिक दंगों का दंश दशकों से देश भुगतते आ रहा, इतिहास की इन पीड़ाओं को विस्मृत कर भी दें तों वर्तमान में वही समस्याएं मुंह बाएं खड़ीं हैं ,समस्याओं से निजात नहीं मिल रही, इस्लामिक आतंकवाद से विश्व झुलस रहा ,ऐसे में अपना देश कोई अपवाद नहीं है । जाति प्रथा की सारी बुराई हिंदू धर्म पर थोपी जाती है पर क्या मुसलमानों में जाति नहीं है ? जाति के साथ -साथ मुस्लिम धर्म में फिरके भी हैं शिया,सुन्नी,अहमदिया ,बरेलवी -- न जानें कितने हिस्सों में मुस्लिम सामाज बंटा हुआ है ।
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जहाँ तीन तलाक हलाला जैसी कुप्रथाएं पर जिहाद एक ऐसा शब्द है जो उन्हें काफिरों से लड़ने के लिए एकजुट कर देता है ,वो किसी भी स्तर तक जाने के लिए तैयार हैं ,बम बनकर फट जाना भी उन्हें श्रेयस्कर लगता है ,ईसाई धर्म में भी रोमनकैथोलिक,बैपटिस्ट ,आर्थोडक्स,प्रोटेस्टेंट जैसे वर्गीकरण हैं जहाँ एक दुसरे के चर्चो में जाने की मनाही है ,पर सारी असमानता का ठिकरा हिन्दुओं पर इस भू -भाग में अफगानिस्तान ,पाकिस्तान ,बांग्लादेश ,भारत और बर्मा में रहने वाले मुसलमान कभी न कभी हिंदू थे,यदि इनका सकल योग किया जाय तो कितने प्रतिशत जनसंख्या का धर्मांतरण हुआ, देश के कितने हिस्से हुए, सहिष्णुता का कोई सकरात्मक परिणाम न राजा दाहिर को मिला, न गाँधी जी को और न आज मिल रहा है ,उनकी सोंच विभाजनकारी ही नहीं परिणामोन्मुखी रहीहै । 1946 के चुनावों ने देश बांट दिया जिन्होंने पाकिस्तान के लिए वोट दिया वो यहीं रह गए, जमीयत ने सारे आतंकवादियों की वकालत की है उनका केस अदालतों में लड़ा है ,हर दुर्दांत आतंकी को क़ानूनी मदद दी है, फिर भी मदनी अपने आपको कौमी एकता की मिसाल बताता है ।
इन आतंकियों के मदद के बाद भी जमीयत आतंकी नही सामाजिक संगठन है फर्ज करिए यदि ऐसा ही काम आरएसएस करती तो बवाल कितना बड़ा होता, कांग्रेस और सारे तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दल जो करते धुर साम्प्रदायिक राजनीति उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ खटकता है ,क्योकि उन्हें असहाय हिंदू भाता है मजबूत हिंदू दंगों में कटने से इंकार कर देगा जागृत हिंदू न सिर्फ अपनी बल्कि हिंदुत्व की भी रक्षा करेगा ,राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का यही जागरण हिंदू सामाज और हिंदू अस्मिता का प्रेरक है ,जिसमे देश की राजनीति ,सामाजिक फिजा बदल दी ,राम मंदिर का निर्माण ,दुसरे मंदिरों के लिए उठती आवाजें वर्शिप एक्ट, वक्फ कानून का विरोध इसी जागृति का परिणाम है ऐसी कौन सी परिस्थिति है, जिसमे अंकगणित ख़ारिज हो जाता है, बीस अस्सी पे भारी पड़ जाता है और क्यों वहीँ परिस्थिति बनायें रखना चाहतें हैं, ये कौन सी धर्मनिरपेक्षता है? दंगो पे दंगे ,महिलाओं और बच्चों को काटा गया ,रक्त रंजित इतिहास से मानवता शर्मसार हुई फिर भी वचन सहिष्णुता के कौन सहेगा ? वैश्विक आतंक की घटनाओं के कारण और कारक दोनों मुस्लिम ही क्यों होतें है ?क्या विश्व सामाज इसके लिए दोषी है या फिर काफ़िर वाली मानसिकता बात -बात पर खून बहाने की धमकी क्या आतंकियों को आमंत्रण नहीं देती ?आतंकियों के प्रश्रय दाता कौन है ? कश्मीर में एक ही उपनाम के हिंदू और मुस्लिम दोनों हैं हिंदू डार घाटी से भगा दिया गया, भगाने वाला मुस्लिम डार था एक ही माटी एक ही आबो हवा एक ही कश्मीर फिर हिंदू मुस्लिम डार में इतना अंतर क्यों ? ये अंतर बताता है गरियाबंद की चुप्पी को और देव बलौदा के हंगामे को, बिरनपुर नही बन पायेगा देव बलौदा क्योंकि --------- हिंदुओं ने हिंदुत्व का मोल समझ लिया है ।
चोखेलाल
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मुखिया के मुखारी व्यवस्था पर चोट करती चोखेलाल की टिप्पणी
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